
प्रकृति का रूप सुंदर निराला
प्रति पल मन मोहने वाला
मंत्र मुग्ध यह कर देता
मन को हर्षित करने वाला!
पौ फटती, भोर मुसकाती
रवि रश्मियां बिखर जातीं
स्वर्णिम आभा चहुं ओर
सुनहरा जाल बुन जातीं!
सांझ ढले दिन ढल जाता
सूरज अस्ताचल को जाता
शांत हो जाता कोलाहल
धुंधलका धीरे-धीरे गहराता!
एक संदेश छुपा इस क्रम में
आवागमन के नियमन में
उदय-अस्त सबको अपनाना
सबका स्थान है जीवन में!
प्रकृति सौंदर्य बोध जगाए
यथार्थ का अनुभव कराए
हर पल में आनंद मनाना
हर बीता पल कहता जाए!
स्वरचित, अप्रकाशित रचना.
मीना जैन.




