साहित्य

किसान (कविता)

सुनील कुमार महला

दिसंबर के घनघनाते
सर्द थपेड़ों के बीच
क्या कभी ठहरकर
किसान को देखा है ?

जब हम रजाइयों में
सपनों की गर्माहट ओढ़ लेते हैं,
तब अलसुबह
वह खेतों की पगडंडियों पर
अपने हौसलों की नाप लेता है।

वह देखता है-
गेहूँ, जौ, चना, मटर,
सरसों, अलसी और मसूर पर
पाले की सफ़ेद चुप्पी
कितनी गहरी उतर आई है।

वह डरता नहीं,
ओस को हथेलियों से सहलाता है,
उसकी चमक में
कल की हरियाली पढ़ता है।

माटी उसके लिए
सिर्फ़ ज़मीन नहीं-
वह उसकी इज़्ज़त है,
उसका धर्म है,
उसकी साँसों की लय है।

मन में विश्वास,
आँखों में आस लिए
वह ईश्वर का धन्यवाद करता है
और धरती की कोख में
हरितिमा बो देता है।

न शिकन है चेहरे पर,
न शिकायत की भाषा।
रूखी-सूखी में भी
उसकी तृप्ति छुपी है,
क्योंकि उसका पुरुषार्थ
नींद से पहले सो जाता है।

वह पूरी धरती का पेट भरता है,
ख़ुद को कभी
भूखा कहकर नहीं पुकारता।

दुनिया दवाइयों और डॉक्टरों में
जीवन खोजती फिरती है,
और किसान-
अपने पसीने, मिट्टी
और मेहनतकश हाथों से
हरदम-हरपल ज़िंदगी उगाता है।

सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार। मोबाइल 9828108858

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!