साहित्य

कर्म का आकाश

ऋतु गर्ग

जब वह छोटी होकर भी
उड़ लेती है नील गगन में।

चीं-चीं करती उड़ती रहती,
पंखों को फैलाती है।

कुछ दानों की खातिर ही वह
नील गगन में उड़ जाती है।

न अभिमान है उसको
अपने छोटे से तन पर,
प्रीति की बोली निभाती है।
दिन भर मेहनत करती है,
प्यार बच्चों पर लुटाती है।

हम दिन भर कुछ काम न करके भी
थकते रहते, मरते हैं।
कुछ मिल जाए आराम से तो
उससे भी परहेज़ करते हैं।

कुछ सीखो उस नन्ही चिड़िया से
जो दिन भर कर्म किया करती।
न कभी थकती, न रुकती है,
कर्मपथ पर सदा चला करती।

इंसान यदि चाहे तो
क्या कुछ नहीं कर सकता है।
अपने आत्मबल के सहारे
यश अर्जित कर सकता है।

नीति-परायण है इंसान,
भगवान ने स्वस्थ शरीर दिया।
धन-बल और वैभव के साथ
जीवन जीने का अधिकार दिया।

फिर क्यों भूल गया है वह
कर्म करना, कर्तव्य निभाना।
अपने ही अधिकारों में
उलझ गया, समर्पण भुलाना।

समता का भाव भी छूट गया,
समर्पण का अर्थ बिसराया।
नित्य सवेरे उठकर के
नन्ही चिड़िया पाठ पढ़ाती है।

जीवन के सच्चे आदर्शों को
यही हमें समझाती है।

ऋतु गर्ग
सिलीगुड़ी, पश्चिम बंगाल

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