साहित्य

परंपरा

डॉ गीता पांडेय अपराजिता

निर्वाह करो
अपनी परंपरा
कभी न भूलो
सत्य सनातन के
भाव पुरातन के।।

परंपरा के
अंतर्गत ही आते
अपने सारे
व्रत और त्यौहार
ले वैज्ञानिक सार।।

रीति-रिवाज
जग में हम सब
सदा मनाते
कुल परंपरा के
अंतर्गत जो आते।।

सदियों से ही
चली आ रही शुचि
धर्म-कर्म की
पावन अपनी ये
शाश्वत परंपरा।।

परंपराएँ
हमारी पहचान
हैं आन बान
हृदय में उमंग
जो भर देती संग।।

परंपराएंँ
भारतीय संस्कृति
आस्था विश्वास
संस्कार और सृष्टि
नियम द्योतक है।।

रिश्तों की डोर
मजबूत रखना
ये परंपरा
तोड़ना मत कभी
याद रखना सभी।।

करें सम्मान
परंपराओं पर
इन्हीं से पर्व
हमें होता है गर्व
मिल के करें सर्व।।

डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

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