
क्या सोचकर भगवन,
तूने यह दुनिया बनाई।
इस दुनिया को बनाके,
कर रहा अपनी बड़ाई।।
भाई को भाई मार रहा,
नर सच्चाई को खा रहा,
आपस में कर रहें लड़ाई।
नर किस पर करें विश्वास,
नहीं रहीं किसी पर आस,
बनें सब जग में हरजाई।
रिश्ते-नाते रह जग में धोखा,
कर्मों का रखते नहीं जोखा,
रिश्तों में नहीं रहीं सच्चाई।
अपनी-अपनी कहते सब,
नर और नारी भूल गए रब,
करते सब रब की रूसवाई।
धन लें देते नहीं किसी का,
कहां साथ देते अब सही का,
देने वाले की ही करते बुराई।
खुद को ही मानें सब बड़ा,
आदमी आदमी से ही लड़ा,
सब जन खुद की करें बड़ाई।
सुनील कुमार”खुराना”
नकुड़ सहारनपुर
उत्तर प्रदेश भारत




