
भारतीय गणित-परंपरा के विराट आकाश में अनेक नक्षत्र चमकते रहे, पर उनमें से एक ज्योति-दीप ऐसी भी है, जिसकी प्रभा अद्वितीय होते हुए भी युगों के प्रवाह में कहीं धुंधला-सी पड़ गई है—वह है भास्कराचार्य की सुज्ञा, सुबुद्धि, सुकोमल हृदयवाली पुत्री लीलावती। आज जब गणित की शिक्षा रूखे सूत्रों और नीरस विधानों की गिरफ्त में जकड़ गई है, तब लीलावती का स्मरण हमें बताता है कि गणित केवल गणना न होकर रस, छन्द और चैतन्य से भरा हुआ ज्ञान का सुरभि-लोक भी है।
दक्षिण भारत की पुण्यभूमि पर भास्कराचार्य—जिनकी गणना विश्व के श्रेष्ठतम गणितज्ञों और खगोलविदों में होती है—अपनी इस सुपुत्री से अपरिमित स्नेह रखते थे। ज्योतिषीय गणनाओं से विवाह-विधाता के अनिष्ट संकेतों को जानकर पिता ने शुभ मुहूर्त की ऐसी साधना की, मानो समय को स्वयं संयमित कर लेना चाहते हों; परंतु भाग्य कभी-कभी मनुष्य के परिश्रम पर अपनी ही रेखा खींच देता है—जलघड़ी में गिरा एक नन्हा-सा मोती मुहूर्त की गति रोक गया, और विधाता ने लीलावती के जीवन में विषाद का द्वार खोल दिया। विवाह के पश्चात वह विधवा हो गई—यही वह वज्राघात था जिसने पिता के हृदय को विदीर्ण कर दिया। किन्तु ज्ञान वह अमृत है जो दुःख की अग्नि को भी शीतल कर देता है। भास्कराचार्य ने अपनी पुत्री को गणित का दिव्य उपदेश देना आरम्भ किया। गुरु–शिष्य का यह अनूठा संवाद कुछ ही वर्षों में लीलावती को गणित, बीजगणित और ज्योतिष की अनुपम साधिका बना गया। इसी वात्सल्य और प्रतिभा के संगम से भास्कराचार्य ने अपने महान ग्रंथ सिद्धांतशिरोमणि के एक अध्याय—पाटीगणित—को अपनी प्रिय पुत्री के नाम पर “लीलावती” अभिधान प्रदान किया। इस प्रकार एक कन्या के नाम में विज्ञान की पूर्ण परंपरा को अमरत्व मिल गया।
‘लीलावती’ ग्रंथ गणित का ग्रंथ मात्र नहीं—यह काव्य-माधुरी से अंकित विज्ञान का अभिनव सौंदर्य है। भास्कराचार्य कहीं अपनी पुत्री को संबोधित करते हैं—
“मृगलोचन लीलावति, यह अद्भुत गणित-सिद्धान्त सुनो…”
और कहीं कमलों, तारों, पुष्पों, नदियों और ऋतुओं की उपमाओं के माध्यम से कठिन गणितीय प्रश्नों को सहज काव्यात्मक रूप दे देते हैं। भास्कराचार्य-रचित लीलावती के आरंभ में वे भगवती सरस्वती को प्रणाम करते हुए कहते हैं—
“भगवत्यै बुद्धिविशुद्धये नमोऽस्तु नः।
स्वभावोक्त्या यया लोके लीलावतिरिवोदिता॥”
अर्थात् बुद्धि को निर्मल करने वाली देवी को नमन है, जिनकी प्रेरणा से यह गणित-विद्या मानो स्वयं सुन्दरी लीलावती बनकर विश्व में अवतरित होती है। विद्या का यही दिव्य स्वरूप आगे के समस्त गणितीय विवेचनों का आधार बनता है। इसी भावभूमि पर भास्कराचार्य बताते हैं कि गणित वह शास्त्र है जिसके द्वारा सभी व्यवहारों और गणनाओं का शुद्धीकरण और नियमन होता है—
“व्यवहारार्थं गणितं शास्त्रमित्युच्यते बुधैः।
येन शुद्धीकृताः सर्वे व्यवहाराः पृथक् पृथक्।”
यह गणित की उपयोगिता और उसकी अनिवार्यता का अत्यंत सरल, परंतु गम्भीर कथन है। इसी ग्रंथ में भास्कराचार्य अपनी पुत्री लीलावती को विविध प्रश्नों के माध्यम से गणित सिखाते हैं। वे एक प्रसिद्ध प्रश्न प्रस्तुत करते हैं—
“यति: पङ्केरुहाणां तृतीयं पञ्चमं तथा।
षष्टं देवायतार्थे यैः कृतं तदनु कीर्त्यताम्।”
अर्थात् — कमलों के समूह का तृतीयांश, पंचमांश और षष्ठमांश क्रमशः देवताओं की पूजा में अर्पित किए गए; अब बताओ कि कमलों की कुल संख्या कितनी थी? इसका उत्तर 120 है। यह श्लोक केवल गणितीय समस्या ही नहीं, बल्कि काव्य-रस में डूबा हुआ एक सुललित उदाहरण है जिसमें गणना मनोरंजन बन जाती है। क्षेत्रफल-निर्धारण के प्रसंग में भास्कराचार्य आयत के नियम को सरल भाषा में कहते हैं—
“दीर्घस्याक्षणयोरन्तरं क्षेत्रं तयोः फलम्।”
अर्थात् आयत का क्षेत्रफल उसकी दोनों भुजाओं—लम्बाई और चौड़ाई—के गुणन से प्राप्त होता है, और भुजाओं के परिवर्तन के साथ क्षेत्रफल भी समान रूप से बदलता है। इसी तरह रैखिक गणनाओं को समझाते हुए वे बताते हैं—
“यद्गुणोत्तरमर्थः स्यात्तस्य संवृद्धिरेव सा।
गुणकं व्येकृतिं ज्ञात्वा मूलं ज्ञेयं न संशयः।”
अर्थात् यदि किसी राशि में समान गुणन से वृद्धि हो रही हो, तो गुणक और अंतर को जान लेने पर मूल संख्या सहज ही ज्ञात की जा सकती है। कर्म-समय की समस्याओं में भास्कराचार्य अत्यंत आधुनिक ढंग से कार्य-वेग (वर्क-रेट) का सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं—
“कर्मकर्तॄणां योगो यः समयो विभक्त एव स्यात्,
कर्मणि तेन ज्ञेयं कार्यसमाप्तिकालनिर्णयः।”
अर्थात् अनेक कार्यकर्ताओं के संयुक्त वेग का योग लेकर कार्य की समाप्ति का समय ज्ञात किया जाता है। यह वही सिद्धांत है जिसे आज गणित में “वर्क ऐंड टाइम” के नाम से पढ़ाया जाता है। इसी प्रकार मिश्रण की समस्याओं पर वे कहते हैं—
“द्रव्याणां मिश्रणं यत्र तद्विशुद्धिं विचक्षणाः,
मित्यंशैः सुलभं विद्यात्प्रत्येकस्य पृथक् पृथक्।”
अर्थात् जब विभिन्न पदार्थ मिश्रित किए जाते हैं, तो उनके अनुपातों को ध्यान में रखकर मिश्रण की मात्रा और शुद्धता का निर्धारण किया जाता है। इस प्रकार लीलावती के श्लोक केवल गणितीय सूत्र नहीं, बल्कि काव्य, बोध, प्रेम, और संवाद की समृद्ध परंपरा हैं। भास्कराचार्य अपनी लाड़ली पुत्री को गणित पढ़ाते समय जिस कोमल हृदय, सौंदर्य-बोध और शिक्षण-कला का परिचय देते हैं, वही उनकी गणितीय प्रतिभा को अमर करता है। यही कारण है कि लीलावती आज भी गणित के इतिहास में क्लासिक ग्रंथ के रूप में पूज्य है—जहाँ गणना एक यंत्रवत क्रिया नहीं, बल्कि सौंदर्य और बुद्धि का समन्वित उत्सव बन जाती है। यह वह शैली है जिसमें गणित समस्या नहीं—कल्पना का पुष्पित उद्यान बन जाता है। यही कारण है कि 16वीं शती में अकबर के दरबारी फैज़ी ने ‘लीलावती’ का फ़ारसी अनुवाद कराया, और 18वीं शती के आरम्भ में इसका अंग्रेज़ी रूप भी विश्व के सम्मुख आया—तभी से यूरोप के विश्वविद्यालयों तक भारतीय गणित की यह अमर गूँज पहुँची।
लीलावती स्वयं भी केवल अध्येता नहीं रहीं; उन्होंने खगोल और गणित दोनों में अद्वितीय प्रवीणता प्राप्त की। पिता-पुत्री की यह युगल-ज्योति भारतीय ज्ञान-परंपरा के नभ में ऐसी दीप्ति बिखेर गई, जिसकी आभा आज भी आधुनिक विज्ञान महसूस करता है। इसी अनुपम योगदान के सम्मान में भारत सरकार द्वारा प्रदत्त “लीलावती पुरस्कार” उनके नाम को युगों-युगों तक स्मरणीय बनाए हुए है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी नई पीढ़ी में उस गौरव-बोध को पुनर्जीवित करें, जिससे वे जान सकें कि भारत का इतिहास केवल साम्राज्यों के उत्थान-पतन का इतिहास नहीं, बल्कि प्रतिभा, साधना, विज्ञान और संस्कृति की अविरल धारा है और लीलावती उस धारा की अमर सरस्वती हैं। एक ऐसी कन्या, जिसने दुःख को साधना में, साधना को विज्ञान में और विज्ञान को अमर कीर्ति में रूपांतरित कर दिया।
©® डॉ. विद्यासागर उपाध्याय




