आलेख

मैं हिडिंबा हूँ

वीणा गुप्त

उस दिन  मेरा मन बहुत  उचाट था। सूर्योदय  से  पहले  ही मेरी आँख खुल गई थी ,मैं  रात भर बेचैन अपने  मनोराज्य में  खोई-खोई ठीक से सो भी नहीं  पाई थी। भविष्य के प्रति  असुरक्षा, वर्तमान की भयावहता, अतीत की कटुता, बार- बार मानस पटल पर सघन मेघ सी घिर- घिर आती थी। हृदयाकाश में  ताप, घुटन, गर्जन, कर्षण सभी कुछ था, पर वर्षण  की अनुमति नहीं थी मुझे। हाँ,  मैं परवश थी। अपने हिस्से का सारा हास्य-रुदन भी मैं इच्छानुसार नहीं  कर सकती थी।  हिडिंब कहने को तो मेरा भाई था, पर  मेरे प्रति उसका  व्यवहार  एक निरंकुश कठोर  स्वामी का सा था। जब चाहता मुझे प्रताड़ित करता  और अपने  अनर्गल  आदेश सुनाता। मुझमें उसकी आज्ञा उल्लंघन का साहस  नहीं  था।
अतीत की स्मृतियाँ मुझे  बार- बार अपनी आगोश में  खींच लेती थीं। कितना सुखद था मेरा बचपन। मेरे माता- पिता मुझे अपने प्राणों से अधिक  प्यार करते  थे पर वे असमय ही मुझे  छोड़कर कभी वापस न आने के लिए  अनंत में खो गए।  मेरी जननी रक्ष कुल की थींं , लेकिन उनका स्वभाव वैसा  राक्षसी नहीं था। मुझ में भी उनका यह भाव आ गया  था। और  यही कारण था कि  मेरे  पिता और हिडिंब  हमारा उपहास करते। वे दोनों रक्ष कुल की समस्त तामसिकता,कुरूपता और वीभत्सता  के साकार रूप थे। उनकी बर्बरता  देख कर जब मैं सहम जाती, तो वे भीषण अट्टहास करते। उनके जाने  के बाद हिडिंब  मेरा संरक्षकऔर हिडिंब -वन का स्वामी बन गया। उसके  सभी अनुचित आदेशों को मानना मेरी नियति थी। वह बहुत आलसी और कामचोर था। अत्यधिक आहार, मद्यपान और मैथुन उसके व्यसन थे। उसके लिए  मैं ही आहार की व्यवस्था करती क्योंकि इस विषय  में अन्य लोगों  पर उसका विश्वास  नहीं  था उसे  लगता कि उसका कोई  भी रक्ष- भृत्य उसके विरूद्ध षड़यंत्र  रच सकता है। उसकी आशंका ठीक भी थी क्योंकि उसके अभिमानी और क्रूर व्यवहार ने उसके अनेक शत्रु पैदा कर दिए थे। मैं भी उसकी नाम मात्र की ही बहन थी उसने कभी मेरे प्रति भाई का कर्तव्य  नहीं  निभाया। वह मुझे मात्र एक विश्वसनीय  दासी मानता था और उसके इसी व्यवहार के कारण उससे बदला लेने की भावना मेरे मन में  प्रतिपल बलवती होती जा रही थी। उस दिन भी मुझ सोती हुई पर लात और मुष्ठिका का प्रहार कर उसने मुझे जगा दिया और आदेश सुनाया कि उसके लिए  भोजन और मद्य की व्यवस्था  करूँ।
“अभी वन में आखेट नहीं  मिलेगा। सूर्योदय होने दो ,तब चली जाऊँगी।” मैंने अनुरोध किया।
वह क्रोधित हो गया। उसने मेरे केश पकड़कर मुझे वृक्ष पर बनी कुटीर से नीचे पटक दिया। “जल्दी  से  आखेट लेकर आ, नहीं तो मैं तुझे ही खा जाऊँगा।”  वह बोला और झोंपड़ी के भीतर चला गया। अपने तन- मन की चोट सहलाती मैं वहीं बैठी अपनी विवशता पर आठ -आठ आँसू बहाती रही। मुझे अपनी माँ की बहुत याद आ रही थी। उसे भी मेरा पिता ऐसे ही प्रताड़ित  करता था। पर वह उसका पति था ,यह तो मेरा भाई हैं। इसे मेरी रक्षा करनी चाहिए, पर यह तो अपनी  ही——–।

मैं  वन में  भटक -भटककर उसके लिए  भोजन की तलाश करने  लगी। अभी भोर की पहली  किरण भी नहीं  फूटी थी। मुझे नींद भी आ रही थी।  समीप ही वृक्षों के पास एक समतल सतह देख कर सो गई। एक निश्चिंत नींद के बाद  उठी तो
याद आया कि मैं तो हिडिंब के लिए आहार तलाशने आई थी। मैं घबराकर उस के लिए आहार की तलाश में  लगी। वैसे भी वह अब तक भूख से  पगलाया सा बैठा होगा, इतनी देर जो हो गई थी। अभी बौखलाया सा मेरी राह देख रहा होगा।थोड़ा आगे बढ़ी तो सहसा ही सामने वाले  वृक्ष के पास रक्षक मुद्रा  में  तैनात एक विशाल आकृति दिखाई  दी।कौन है यह? जिज्ञासा  लिए आगे बढ़ी तो  हैरान हो गई  पेड़ के नीचे पाँच मानव प्रगाढ़ निद्रा में सोए हुए थे। और उनका यह साथी  उनकी  रक्षा में तैनात था। मैं प्रसन्न  हो उठी, इतनी आसानी से प्रचुर भोजन सामग्री  जो  मिल गई  थी। दबे पाँव वृक्ष की दूसरी
ओर पहुंँच गई सोचा था किसी एक को उठाकर ले जाऊँगी। पर इसी समय रक्षक की दृष्टि  मुझ पर पड़ गईं। उसकी दृष्टि  में निर्भीकता और जिज्ञासा  थी। वह तप्त सोने के से वर्ण का, भीम काय परंतु सुडौल पुरुष था। उसका अंग- प्रत्यंग सांचे में  ढला और कमनीय था। मुख पर एक अभिजात्य  कांति थी। उसे देख कर मेरा मन पिघल रहा था। मैं उसके  आकर्षण  में खिंची जा रही थी। मैं अपने  आने का उद्देश्य  भूल गई और अनिमेष उसकी ओर निहारने लगी। वह भी प्रश्न  भरी और सतर्क दृष्टि  से मेरी ओर देख रहा था और मेरे कुत्सित इरादे को भाँप कर मुझ से लड़ने  को भी तैयार था। मुझे  यह देखकर और भी हैरानी  हुई कि उसने  सोए हुए मनुष्यों को उठाकर आगामी खतरे से सचेत करने का  कोई प्रयास नहीं  किया। यानि उसे अपनी भुजाओं की शक्ति पर पूर्ण विश्वास था कि वह मुझे परास्त करने  में  सक्षम है। उसका यह आत्मविश्वास  मुझे उसके  प्रति एक उद्दाम काम- आकर्षण में बाँध रहा था। यहाँ प्रेम की बात नहीं थी केवल उसके डील डौल, उसके बल और उसके  शारीरिक आकर्षण  ने ही मुझे  उसकी ओर खींचा था। वैसे भी मैं एक नर भक्षिणी राक्षसी थी, पुरूष का रूप, गुणऔर शील मेरे लिए कोई  महत्व नहीं  रखता। मैंने सीधे उसके पास जाकर ,स्पष्ट शब्दों में अपनी कामेच्छा उस पर प्रकट कर दी। उसे मेरी बात सुनकर  न तो कोई आश्चर्य हुआ और ना ही कोई वितृष्णा। इसी मध्य आहट पाकर शेष सोए हुए लोग भी जाग गए और वस्तु- स्थिति जानने की चेष्टा करने लगे। उनमें चार पुरुष और एक स्त्री थी। चारों पुरुष अत्यधिक  रूपवान और बलिष्ठ और तेजस्वी  थे। पर उनके प्रति  मेरे मन  में  कोई आकर्षण नहीं  जागा। उनके साथ की स्त्री भी बहुत महिमामयी और गरिमायुत थी। उसका डीलडौल  भी विशाल था। वह अधेड़ आयु की थी। मैं समझ गई  कि यह स्त्री इन की माँ होगी। ये चारों युवक भी अब सतर्क और सन्नद्ध हो गए  थे। पर मेरी ओर से कोई प्रहार की आशंका न देखकर शांत थे। मैं उस विशाल काय पुरुष की ओर बढ़ी और फिर एक बार अपनी इच्छा  दोहरायी। वह तो कुछ  नहीं बोला लेकिन उसकी माँ  ने इस प्रस्ताव  का विरोध और मेरी इस निर्लज्जता की भर्त्सना की। वे आर्य थे  और रक्ष कुल  की एक स्त्री का यह  प्रस्ताव  उनके  लिए  बेहद अप्रिय था। फिर भी (उसने  बाद में  मुझे  उनका परिचय मिल गया था) महारानी  कुंती ने इसे आर्य मर्यादा  का उल्लंधन बताया। बड़े पुत्र के अविवाहित  होने के  कारण छोटे  के परिणय की बात सोचना उनके  कुल के अनुकूल नहीं  था।  लेकिन मेरे हठ करने पर और पुत्र के मौन को ध्यान  में  रख कर उन्होंने  बेमन से इसे सशर्त स्वीकारा। शर्त थी कि केवल संतानोत्पत्ति तक भीम मेरे साथ रहेगा और उसके  बाद वह हमेशा के लिए मुझे  छोड़कर चला जाएगा और मैं  हस्तिनापुर के शासन पर अपनी या अपने  पुत्र की कोई दावेदारी पेश  नहीं  करूँगी। मैंने इसे  सहर्ष मान लिया वैसे भी हमारे  रक्ष कुल  में इन सभ्य समाज के नियमों  की कोई दखल नहीं  थी,न ही मुझे राजसी सुख भोग चाहिए  थे। मैं अपनी  वर्तमान  स्थिति में  पूरी तरह संतुष्ट  थी। विवाह  हमारे लिए सभ्यकुलों की भाँति   आजीवन संबंध  नहीं  था। केवल शारीरिक काम वासना और तृप्ति संबंध  ही महत्व रखते थे। आज मुझे  कुंती द्वारा  दी गई  अनुमति  का एक और पक्ष भी दिखाई दे  रहा है। वे लोग अपने वन वास के कष्ट साध्य समय से  गुजर रहे थे।वे अनेक प्राकृतिक और अप्राकृतिक  आपदाओं से उन्हें  जूझ रहे थे। ऐसे में  उन्हें मेरे रुप में  एक सुरक्षित  आश्रय मिल रहा था।
इसी समय हिडिम्ब मुझे  तलाशता हुआ, वहांँ आ गया वह मेरे हाव -भाव को देख सब समझ गया । वह गुस्से से उबल रहा था।उसने अपशब्द  कहते  हुए मुझे बाल पकड़कर खींचा और जोर से तीन- चार लातें मारीं।
“यहाँ आकर  रंगरलियाँ कर रही है दुष्टा और वहाँ मैं भूख से मरा जा रहा हूँ। मैं अभी तेरा सारा  खुमार उतारता हूँ। ” वह पैशाचिक  स्वर में  बोला और  फिर उसने निर्दयता से  मुझ पर आक्रमण किया। इससे  पहले  वह और वार कर पाता भीम ने उसकी लात  पकड़कर उसे  जोर से मरोड़ दिया वह धड़ाम से धरती पर आ गिरा। उसकी लात वृक्ष से खींची गई  टहनी सी झूल रही थी। इसी समय भीम उसकी छाती पर सवार  हो  गया और अपने  प्रबल मुष्टिक प्रहारों से उस पर  ताबड़तोड़  प्रहार करने लगा। “अरी कुलटा, अपने  प्रेमी से अपने  भाई को पिटवा रही है। अरी निर्लज्जा,अभी  तुझे इसका मजा चखाता हूँ।” उसने भीम को अपने  वक्ष से  धकेला और किसी तरह अपनी  टूटी टाँग संभालता, पास ही पड़े एक विशाल पत्थर को लेकर,लंगडा़ता हुआ  मुझ पर झपटा। इससे  पहले  कि वह मेरा सिर पत्थर के प्रहार से चकनाचूर  कर दे।भीम ने उसका वह हाथ पकड़कर  कर इतनी जोर से झटका कि उसकी भुजा उखड़ कर ,भीम के  हाथ में आ गई,जिसे उसने  पूरी ताकत से  दूर फेंक दिया।  हिडिंब भीषण आर्तनाद करता जमीन पर  गिर पड़ा। उसके शरीर से रक्त का फव्वारा  फूट रहा था। अब तो भीम पूरी तरह आक्रामक  हो चुका था उसने  हिंडिब की  दूसरी भुजा भी उखाड़ दी। वह जमीन पर पड़ा तड़प रहा था और कातर दृष्टि से  मुझे देख रहा था। वह चाहता था मैं उसे  बचाऊँ। उसकी सहायता  करूँ। पर  मुझे  उसकी इस हालत  पर कोई दया नहीं  आ रही थी। बल्कि मेरा प्रतिशोध अब शांत हो रहा था। मैं तो खुद उससे  मुक्ति  पाना चाहती थी। मैं अपने  मनभावन पुरुष के बल को देख कर  आह्लादित थी। हम रक्षकुल में  संबंधों में  कोई भावुकता नहीं  होती। मेरा तटस्थ आचरण इसका प्रमाण था। भीम लगातार  उस पर प्राणातंक प्रहार कर रहा था।   हिडिंब मर चुका था। पांडवों और उनकी माँ की दृष्टि  में मेरे प्रति घृणा थी। वे भाई के वध को इतनी तटस्थता से देखने वाली मुझे धिक्कार रहे थे।पर मुझे इससे कुछ लेना देना नहीं  था।  मेरा आकर्षण उस बल शाली  पुरुष के प्रति  बढ़ता ही जा रहा था। हिंडिंब के  वध के बाद मेरा विवाह भीम के साथ  हो गया।  हिडिंब के  बाद वही  वृकोदर नाम से इस वन का शासक बन गया। साल भर में  ही घटोत्कच  का जन्म हो गया और उसके  बाद  शर्त के अनुसार  भीम और अन्य पांडव, अपनी माता कुंती समेत हमें छोड़कर चले गए थे। मैंने पूरे समय उन लोगों  की सेवा की,इसी कारण जाते समय उनका और माता कुंती का स्नेह पा सकी। उन्होंने भारी मन से मुझसे विदा ली। अपने पौत्र घटोत्कच को दुलराया।
और आज इतने वर्षों बाद शालिहोत्र ऋषि  के आश्रम से समाचार आया है पांडव और कौरवों के युद्ध का। शालिहोत्र मुनि का आश्रम हिंडिब  वन की सीमा पर है। राक्षस वहाँ नहीं  जाते। वृकोदर के शासक बनने के बाद वह स्थान पूर्णतः सुरक्षित है। घटोत्कच पिता की सहायता  के लिए  युद्ध भूमि कुरूक्षेत्र  में  चला गया  है। उसका किशोर पुत्र बर्बरक भी पिता के साथ  जाने को तैयार  था । किसी  तरह उसे रोका है, पर कब तक रोक पाऊँगी ।आखिरकार रक्त के संबंध  जोर तो मारेंगे ही। मैं हर्ष-विषाद  लीना हिंडिंबा भले ही राक्षसी  हूँ, पर माँ भी तो हूँ। मेरे पति, पुत्र ,पौत्र सुरक्षित रहे ,बस मेरी यही कामना है।
और अनेक बार मना करने पर भी बर्बरक युद्ध क्षेत्र में चला ही गया। अनेक दिव्य अलौकिक शक्तियों से युक्त है मेरा यह प्रपौत्र। कह रहा था , “पितामही, अब आप देखना ,इस महाभारत के युद्ध का निबटारा मैं पलभर में कर दूँगा । ”
मैं जानती हूँ, उसके लिए यह संभव है। निमिष मात्र में ही जीवित और मृत को चिन्हाकिंत कर उन्हें तत्क्षण दंडित करने की क्षमता है इसमें। पर मैं यह भी जानती हूँ कि श्रीकृष्ण उसे ऐसा नहीं करने देंगे। कितनी- कितनी प्रतिज्ञाएं की हुई हैं दोनों पक्ष के योद्धाओं ने, एक दूसरे के विषय में। अपमान- ज्वाल दग्धा, मेरी सपत्नी द्रुपद कन्या की द्रौपदी की उन्मुक्त केशराशि का प्रक्षालन, दुःश्शासन के रक्त से करने की भीषण प्रतिज्ञा तो स्वयं भीम ने की है। उसके बाद ही तो पांचाली का केश श्रृंगार होगा। और भी अनेक प्रण हैं, जिनका निर्वहण अनिवार्य है। श्रीकृष्ण ,इन्हें कदापि मिथ्या नहीं होने देंगे।

शीघ्र ही इस युद्ध का अवसान हो, और मेरे पुत्र और पौत्र मेरे पास सुरक्षित लौट आएं। अपने पतिकुल की विजय का सुसमाचार जब तक मुझे नहीं मिल जाता,मेरा चित्त उद्विग्न रहेगा। भले ही मैं राक्षसी हूँ, पर माँ भी तो हूँ न। मेरी ममत्व- धारा किसी भी अशुभ अनहोनी से प्रतिहत न हो, केवल यही आकांक्षा है मुझ हिडिंबा की।
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वीणा गुप्त
नई दिल्ली

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