आलेख

अटल जयंती पर खास:जन जन के प्रिय एक शाश्वत ‘अटल’नायक

डॉ०घनश्याम बादल

यदि आज भी अटल बिहारी वाजपेयी राजनीति में अजातशत्रु और जनमानस के सर्वाधिक लोकप्रिय नाम हैं तो उसके पीछे उनका प्रखर व्यक्तित्व कुशल व्यवहार राजनीति की समझ सभी दलों में स्वीकार्यता कुछ बड़े कारण हैं।
एक जुझारू नेता एवं प्रधानमंत्री तथा जनसंघ और भाजपा अध्यक्ष के रूप में अटल अटल बिहारी वाजपेई ने भारतीय राजनीति में कई नए अध्याय जोड़े तो कई पुराने मिथक तोड़े भी। वें पहले सफल गैर कांग्रेसी गैर गांधी खानदान के लोकप्रिय प्रधानमंत्री बने, अंतरराष्ट्रीय दबाव एवं अंदरूनी राजनीति की परवाह किए बगैर भारत को वास्तविक परमाणु शक्ति बनाया, विपक्ष में रहकर भी संयुक्त राष्ट्रसंघ में देश का प्रतिनिधित्व किया, वहां पहली बार हिंदी का परचम लहराया । अटल ने भारतीय राजनीति को नई शक्ल व शक्ति दी और देश की जनता को कांग्रेस से हटकर सोचने का नया दर्शन दिया ।
अटल का राजनीतिक सफर उतार चढ़ाव से भरपूर रहा 1951 में जनसंघ के संस्थापक सदस्य अटल ने अपनी कुशल वक्तृत्व शैली से राजनीति में रंग जमाया । पर वें लखनऊ में लोकसभा उप चुनाव हार गए, 1957 में जनसंघ ने उन्हें तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया लखनऊ में हारे , मथुरा में जमानत जब्त हुई लेकिन बलरामपुर से चुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंच, अगले पाँच दशकों के अटूट संसदीय करियर की शुरुआत की ।
1968 से 1973 तक भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष रहे अटल आपातकाल में जेल भी गए और 1977 में जनता पार्टी सरकार में विदेशमंत्री बने, इस दौरान संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया । 1980 में वें बीजेपी के संस्थापक सदस्य रहे और 1986 तक अध्यक्ष व बीजेपी संसदीय दल के नेता । वें नौ बार लोकसभा के लिए चुने गए ,दूसरी लोकसभा से तेरहवीं लोकसभा तक. बीच में कुछ लोकसभाओं से उनकी अनुपस्थिति भी रही. खासतौर से 1984 में जब वह ग्वालियर में कांग्रेस के माधवराव सिंधिया के हाथों पराजित हो गए । अटल बिहारी वाजपेई 1962 से 1967 और 1986 में राज्यसभा के सदस्य रहे ।
शिंदे की छावनी का बालक ‘अटल्ला’ परिपक्व एवं उदार राजनीतिज्ञ के रूप में 16 मई 1996 को पहली बार प्रधानमंत्री बना लेकिन लोकसभा में बहुमत साबित न कर पाने से 31 मई 1996 को संख्या बल के आगे नतमस्तक होने के वक्तव्य के साथ त्यागपत्र दे दिया । इसके बाद 1998 तक अटल लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे। 1998 के आमचुनावों में सहयोगी पार्टियों के साथ लोकसभा में अपने गठबंधन का बहुमत सिद्ध किया और एक बार फिर प्रधानमंत्री बने लेकिन जयललिता व अन्नाद्रमुक के द्वारा गठबंधन से समर्थन वापस ले लेने से केवल 13 महीना में ही उनकी सरकार गिर गई ।
1999 में चुनाव राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साझा घोषणापत्र पर हुए, इन चुनावों में वाजपेयी के नेतृत्व को एक प्रमुख मुद्दा बनाया गया तो गठबंधन को बहुमत हासिल हुआ और वाजपेयी ने फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली इस बार वें पूरे कार्यकाल के प्रधानमंत्री रहे पर अगले चुनाव से पहले ही अटल ने चुनावी राजनीति से संन्यास की घोषणा कर एक नया मानक बनाया जिस पर वें अंत तक अटल रहे । उसके बाद न राजनीति की और न ही चुनाव लड़ा अटल उस समय रिटायर हुए जब वें चाहते तो राजनीति में बहुत कुछ कर सकते थे ।अटल की यही तो खूबी थी कि वें पदों से भागते रहे और पद उनके पीछे भागते रहे ।
अटल के लिए जीवन का शुरुआती सफर आसान न था प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज और कानपुर के डीएवी काॅलेज में लेकर उन्होंने राजनीतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर किया और पत्रकारिता शुरु की । राष्ट्रधर्म, पांचजन्य और वीर अर्जुन का संपादन किया व पं0 दीनदयाल उपाध्याय के सान्निधय ने उनके प्रखर रूप व प्रतिभा को निखारा।अटल अपनी कुशलता से तात्कालिक पत्रकारिता के आदर्श बने । 30 जनवरी 1948 को गांधी जी की हत्या के बाद सरकार द्वारा संघ पर प्रतिबंध लगाने पर ‘राष्ट्रधर्म’ कार्यालय सील कर दिया गया तो अटल भूमिगत हो गए। न्यायालय के आदेश से राष्ट्रधर्म का ताला खुलने के बाद अटल ने नवंबर में दैनिक ‘स्वदेश’ शुरु किया। बाद में काशी से प्रकाशित ‘चेतना’ साप्ताहिक का भी संपादन किया ।
अटल बिहारी बाजपेयी के शासन काल में भारत एक सशक्त परमाणु शक्ति सपन्न राष्ट्र बना और भारत में स्वच्छ सुशासन की राजनीति का उद्घोष हुआ। अटल एक महान राजनेता ही नहीं अपितु साहित्यकार, पत्रकार, संपादक व कुशल कवि तथा वक्ता भी रहे हैं। अंत समय में बीमारी के चलते अटल ज्यादा नहीं बोल पाते पर अपने वक्त में उनका बोलने का अंदाज निराला व मनमोहक रहा । उनकी भाषण कला के लिए नेहरु व इंदिरा जैसे विरोधी नेता भी उन पर फिदा रहे । नेहरू ने तो उन्हें बहुत पहले ही भविष्य का प्रधानमंत्री भी कह दिया था विदेशमंत्री के रूप में वें अटल सर्वाधिक लोकप्रिय हुए तथा विदेशों में व अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को निखारने में अद्भुत योगदान दिया।
अटल राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय व संवैधानिक विषयों के गूढ़ ज्ञाता थे। विद्यार्थी जीवन में ही ओजस्वी वक्ता बन 1946 में संघ में शामिल होे, वकालत की पढ़ाई बीच में ही छोड़ खुद को संघ के प्रति समर्पित कर दिया।
अपने प्रधामंत्रीत्व काल में अटल का रणनीतिक कौशल देखकर राजनैतिक समीक्षक दंग रहे। कई विपरीत नीतियों रीतियों वाले दलों के गठबंधन को उन्होने बड़े ही कुशल ढंग से संभाला, एक तरह से मेंढकतौल के खेल में भी वें सफल रहे । परमाणु बम बनाने के बाद भी उन्होने देश को अमेरिका व दूसरे देशों के दबाव में नही आने दिया ।
अटल का एक ही सपना रहा, एक पराक्रमी व सक्षम भारत बनाने का । उनके धुर विरोधी नेता भी मानते थे कि उनका चिंतन व मनन अद्भुत था, अटल की ख़ास बात रही कि वें वक्त पड़ने पर अपनी बेलाग बातें कहने से कभी नहीं चूके । जब अडवाणी की रथ यात्रा के बाद संसद में उन्हे संसदीय दल का नेता बनाया जा रहा था तब उन्हाने कहा था इन भालू बंदरों को संभालना मेरे बस की बात नहीं है और जब गुजरात में गोधरा कांड हुआ तब वें प्रधानमंत्री थे और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वहां के मुख्यमंत्री थे जब पत्रकारो ने पूछा अब मुख्यमंत्री को क्या करना चाहिए तब अटल ने कहा था “उन्हें अपना राजधर्म निबाहना होगा” । भारत रत्न अटल की नीतियां अद्भुत थी संघ के नियंत्रण एवं विपक्ष के नेताओं की घेराबंदी के बावजूद वे हिंदुत्व और धर्मनिरपेक्षता में एक अद्भुत सामंजस्य बनाने में सफल रहे। अटल क्षणिक लाभ के लिए धर्म जाति या संप्रदायवाद को बढ़ावा देकर वोट हासिल करने को अनैतिक मानते थे।
कुशल शासक, कवि, पत्रकार एवं प्रखर वक्ता, रणनीतिकार एवम उदारवादी नेता अटल को उनकी जयंती पर नमन ।
डॉ० घनश्याम बादल

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