
नवादा में कहा जाता है कि यहाँ सिर्फ़ लोग नहीं बोलते,
यहाँ चौक भी बातें करते हैं।
सुबह की पहली धूप जब शहर में उतरती है,
तो सबसे पहले वह लोकतंत्र चौक पर ठहरती है।
प्रजातंत्र द्वार के नीचे से गुजरते लोग
आज भी आज़ादी की यादों को सिर झुकाकर नमन करते हैं।
कभी यहीं से जुलूस निकले,
कभी यहीं पर उम्मीदों ने आवाज़ पाई।
हर कदम जैसे कहता हो—
“लोकतंत्र सिर्फ़ शब्द नहीं, जिम्मेदारी है।”
थोड़ी दूर पर है सद्भावना चौक।
यहाँ न कोई ऊँचा द्वार है, न भव्य प्रतीक—
बस लोग हैं।
चाय की दुकानों पर बैठी चर्चाएँ,
टूटी सड़क पर चलती उम्मीदें,
और सुविधाओं की कमी पर होती बहसें।
फिर भी, हर बहस के अंत में
भाईचारे की मुस्कान बची रहती है।
इन दोनों चौकों ने नवादा को गढ़ा है।
एक ने उसे आत्मसम्मान दिया,
दूसरे ने सह-अस्तित्व।
इसी संतुलन से शहर आगे बढ़ता रहा।
नवादा समझना हो
तो उसकी इमारतें नहीं,
उसके चौक पढ़िए—
क्योंकि यहाँ रास्ते नहीं,
कहानियाँ मिलती हैं।
ज्योती कुमारी ✍️
नवादा(बिहार)



