साहित्य

अपने लिए जलाया दीप

दया भट्ट दया

लघु कथा

अनन्या कई दिनों से भीतर ही भीतर थकी हुई थी। कोई बड़ा कारण नहीं था—बस अपेक्षाएँ थीं, तुलना थी और लोगों की राय का अनावश्यक बोझ। हर शाम वह बालकनी में खड़ी होकर सोचती रहती—लोग क्या कहेंगे, लोग क्या समझेंगे।एक रात अचानक बिजली चली गई। पूरा घर अँधेरे में डूब गया। अनन्या ने बिना सोचे एक मोमबत्ती जला ली। कमरे में हल्की-सी रोशनी फैल गई। खिड़की से बाहर देखा तो पूरी कॉलोनी अँधेरे में थी, लेकिन उसकी छोटी-सी लौ किसी से अनुमति नहीं माँग रही थी, किसी को जवाब नहीं दे रही थी। वह बस जल रही थी—निश्चल और आत्मविश्वास से भरी।
उसी क्षण अनन्या को एक सरल-सा सत्य समझ में आ गया। रोशनी इसलिए नहीं जलाई जाती कि कोई देखे, बल्कि इसलिए कि अँधेरा हावी न हो सके। जैसे दुख को भी तभी तक ताक़त मिलती है, जब तक हम उसे दूसरों की राय से पोषित करते रहते हैं।उस रात अनन्या ने अपने मन से एक अनकहा समझौता किया। अब वह अपने निर्णयों के लिए बाहरी स्वीकृति नहीं माँगेगी। जो उसे भीतर से सही लगेगा, वही उसका मार्ग होगा।सुबह तक दुख पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था, लेकिन उसका भार हल्का हो चुका था। अनन्या पहले से अधिक सीधी खड़ी थी। आत्मबल उसके भीतर शांत रूप से जल रहा था—बिना शोर, बिना प्रदर्शन, और किसी की परवाह किए बिना।

* *दया भट्ट दयाश, खटीमा ,उधम सिंह नगर (उत्तराखंड*)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!