साहित्य

नारी का मोल (आधुनिक दहेज प्रथा)

ज्योती वर्णवाल

दहेज प्रथा को लाकर तुम, नारी का मोल क्यों करते हो,
अपने बेटे की कीमत तुम, रुपयों से ही तय करते हो।
संकीर्ण सोच की जंजीरें,अब तो मिल कर तोड़ो तुम,
दहेज के इस लालच से,अपना नाता छोड़ो तुम।
गर्व से कहते तुम हो दुनिया से, “हमने दहेज नहीं लिया”।
पर रिसॉर्ट और होटलों का,भारी बिल थमा दिया।।
दहेज का नया मुखौटा पहन कर ‘स्टैंडर्ड’ अपना बताते हो।
दिखावे की चकाचौंध में, रिश्तों की बलि चढ़ाते हो।
कहाँ गया वो अपनापन? कहाँ गई वो सादगी?
इस दिखावटी दुनिया में, खो गई वो बंदगी।
नानी,मौसी और बुआ के,वो गीत भी अब खो गए,
जिनको सुनकर मंडप में, सबकी आँखें भी रो पड़े।
अब गीत गाने वालों की भी, मंडली बुलाई जाती है,
रिश्तों की उस मिठास की,अब बोली लगाई जाती है।
दादी-नानी अलग कमरों में, होटलों में सोती हैं,
वो जो साथ बैठती थीं कभी, अब यादों में बस होती हैं।
उस गरीब पिता की लाचारी का, कैसे मोल लगाओगे?
बेटी की खुशियों की खातिर, कर्ज कहाँ से लाओगे?
रिश्तेदार और बच्चों की, उन फरमाइशों के खातिर,
डूबा रहता है कर्ज में वो,बस अपनी पगड़ी के खातिर।
बच्चों! तुम तो समझो जरा, माँ-बाप की मजबूरी को,
दिखावे की इस आग से, बना लो अपनी दूरी को।
वही पैसा जो बह जाता है,चंद घंटों के दिखावे में,
काम आएगा बुढ़ापे में, और तुम्हारा भविष्य बनाने में।
अंत करो, हाँ अंत करो, इस दहेज के व्यापार का,
मानवता का बीज बोओ, सम्मान करो परिवार का।
बेटी को बोझ न समझो, उसे पढ़ाओ और बढ़ाओ,
दहेज लेना छोड़कर, इंसानियत का मान बढ़ाओ।

ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!