साहित्य

नीर

नीलम अग्रवाल "रत्न"

संसार से लोक लज्जा उठी आज,
सूखा सभी लोग के आँख का नीर ।
सौगात पोशाक कैसे फटे हाल, ये साज सज्जा अनोखी भरे पीर ।।
बेटी बहू के सहे बोल मां बाप, कैसे दिखाए कलेजा यहां चीर ।
ये मौन धारे किए आँख को बंद, बैठे दिलों में रहे धार के धीर ।।

संतान ऐसी विधाता घड़े आज, देखो चलाती यहाँ बोल के तीर ।
थोड़े घरों में बचे आज संस्कार, औलाद ठंडा पिलाए जहाँ नीर ।।
सम्मान देखो बड़ों का कहाँ भान, माने जमाना यहाँ पुत्र को वीर ।
बेखौफ कैसा जमाना चले चाल, छोटे सभी तो घरों के बने मीर ।।

सेवा करो बाप माँ की सुनो पुत्र, ऊँचे चढ़ोगे सदा मान लो गीर ।
मेवा मिलेगा मिले मान सम्मान, जानो मिलेगी बुलंदी सदा जीर ।।
पूजा यही है यही पुण्य धार्मिक, हैं तीर्थ चारों यही गंग का नीर ।
बोलो हमेशा इन्हें प्यार से बोल, खाने मिलेगी तुझे रोज ही खीर ।।

नीलम अग्रवाल “रत्न” बैंगलोर
🙏🙏

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