साहित्य

गज़ल “सीने पर पत्थर”

दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’

अल्प वेतन में किसको, क्या-क्या मैं दिलवाऊँगा,
सीने पर पत्थर रखकर, पहले बेटा-बेटी पढ़ाऊँगा।

घर की चाहत, रिश्तों के ताने, मन को रोज़ जलाते हैं।
आँसू पीकर भी हर दिन, हँसता चेहरे ही दिखलाऊँगा।
सीने पर पत्थर रखकर…..

पत्नी की उम्मीदें भारी, अपनों की बातें चुभती हैं,
टूटे सपनों के टुकड़ों से, फिर भी घर को सजाऊँगा।
सीने पर पत्थर रखकर…..

खुद की खुशियों को मैंने, जैसे गिरवी रख डाला है,
बच्चों के उज्ज्वल कल हेतु, हर दुख को अपनाऊँगा।
सीने पर पत्थर रखकर……

थक जाता हूँ कभी-कभी मैं, जिम्मेदारी के बोझ तले,
पर उनके सुनहरे सपनों को, कैसे मैं झुठलाऊँगा।
सीने पर पत्थर रखकर……

रातों की नींदें बेचकर भी, दिन में श्रम करता रहता हूँ,
उनकी हर एक मुस्कान पे, अपना जीवन लुटाऊँगा।
सीने पर पत्थर रखकर…..

“दिव्य” यही संघर्ष मेरा, जीवन की सच्ची गाथा है,
अल्प वेतन में भी देखो, घर को स्वर्ग बनाऊँगा।

अल्प वेतन में किसको,क्या क्या मैं दिलवाऊंगा
सीने पर पत्थर रखकर, पहले बेटा-बेटी पढ़ाऊँगा।

✍️दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश

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