
सफेद धुआं सा उठ रहा हैं
बिन अग्नि का, ये धुआं है
एकाकीपन छा गया सब ओर
सुनाई न दे रहा अब कहीं शोर
पंछी भी न कहीं दिख रहे हैं
गगन धुँधला हो गया आज
हवा की कोई आहट भी नहीं
साँस लेने में घुटन सी हो रही
कोई काम करना आसान न है
उत्सव पर्व भी न है अब कहीं
बस अपनी दिनचर्या जी रहे हैं
श्वेत शीत धुएँ में से गुजर रहे हैं
सूर्य किरणों की झलक नहीं है
शांति दिन पर दिन बढ़ रही है
किससे मिलने सूर्य चले गये हैं
या श्वेत धुएँ से भयभीत हो गए हैं
बढ़ रही है ठंडक दिन पर दिन
सूक्ष्म हिम कण बिखर रहे हैं
लगे सफेद धुंध की चादर देख
कपास पुष्पक्रम बिखर रहे हैं
मीनाक्षी शर्मा ‘मनुश्री’
गाजियाबाद (उ. प्र.)



