
पागल मनवा सुख को ढ़ूँढ़े,
इस नश्वर संसार में।
दर-दर भटक रहा है मानव,
दौलत के बाजार में॥
कौड़ी-कौड़ी माया जोड़े,
रचता नित्य प्रपंच है।
अपने हित के खातिर मानव,
सोचे तनिक न रंच है॥
धर्म ईमान की बोली अब,
लगती है दरबार में।
पागल मनवा सुख को ढूँढे,
इस नश्वर संसार में॥
सदा स्वार्थ की बातें करता,
नित्य जेब अपनी भरे।
सदाचार की बात न माने,
हरपल मनमानी करे॥
धोखा देता फिरता निशदिन,
सदा स्नेह अरु प्यार में।
पागल मनवा सुख को ढूँढे,
इस नश्वर संसार में॥
अपनो से नित दूर हुआ है,
मोबाइल के जाल में।
सदा झलकती चिंता रहती,
इनके मस्तक भाल में॥
अपनो से भी छल करता है,
निष्ठुर शिष्टाचार में।
पागल मनवा सुख को ढूँढे,
इस नश्वर संसार में॥
© डॉ॰ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश
संपर्क सूत्र 9452252582




