राजस्थान

पीड़ाओं से परिणय को फिर, यादों पर ढोया होगा

साँसों पर लिखने से पहले, हर अक्षर बोया होगा ।। - लक्ष्मण लड़ीवाला रामानुज

राष्ट्रीय समरस साहित्य सृजन संस्थान,,(जयपुर ई) की 32वीं काव्य गोष्ठी दि.18 दिसंबर, 2025 को महासचिव नीता भारद्वाज के निवास पर बैंगलूरु से पधारी कवयित्री विनीता लवानिया की सरस्वती वंदना के साथ प्रारंभ हुई । गोष्ठी में डॉ. अंजू सक्सेना ने वर्तमान की सच्चाई पर कविता सुनाई – ‘अब खुद को ही बोझिल समझने लगी हूं, वाट्सएप, फेसबुक सबसे ऊबने लगी हूं। पर यह भी मुझे रास नहीं आता’ । और ‘घड़ी घड़ी न मुहब्बत के गीत गाया करो । और ‘तेरे बिना ये जीवन मेरा जैसा अधूरा साया है !’ मार्मिक रचना सुनाई ।
कवयित्री रंजिता जोशी ने -‘न पूछ इश्क में हम क्या क्या छोड़ आए, किसी का दामन तार तार कर आए, किसी को फूलों से भर आए ।’ और – आँसूऑ को पी लिया हमने, सागर को भरा छोड़ आए’ सुनाकर वाह वाही लूटी । दूसरे दौर में थोड़ी लबों से पिलाई जाए, फिर उतरे तो आँखों से पिलाई जाए, सुनाकर दाद पाई ।
वैद्य भगवान सहाय पारीक ने ‘पप्पू की हिन्दू विरोधी घटिया हरकतों को कैसे भूले हम’ राजनैतिक व्यंग्य में साधा। और – ‘हाल क्या है कांग्रेस का हमसे पूछो भला’ पैरोडी सुनाकर खूब तालिया बटोरी ।
अर्चना सिंह ‘अना’ ने -‘चश्मा बैठा नाक पर,पकड़े दोनों कान। हाथों में चलभाष है, मत डालो व्यवधान !’ रोचक दोहे और एक सवैया के बाद रचना- शब्दों की पतवार लिए मै जीवन नैया ख़ै लेती’ सुनाई । दूसरे दौर में – ‘आ गई बेला विदा की’ बहुत ही हृदयस्पर्शी गीत सुनकर सभी को भावुक कर दिया ।
महासचिव नीता भारद्वाज ने माँ सरस्वती वंदना -‘यही आशीष दे दो माँ’ के साथ भावपूर्ण गीत प्रस्तुत कर वाह वाही लूटी। विनीता लवानिया -हुई रक्तिम प्रभा देखो हुई रक्तिम दिशा देखो । लालिमा छाई है नभ में, हुई अरुणिम धरा ये देखो । इसके बाद सरस भावों का – ‘राधे के द्वारे चलो रे प्यारे’ भक्ति भाव से सराबोर भजन सुनाकर भक्तिमय माहौल बनाया ।
श्री राजकुमार जी चौहान ने – ‘वो आकर मुझ से प्रेम जताती थी, माँ उसकी खूब चिल्लाती रही। वो मेरे तन से लगी, माँ अब उसकी बेफिक्र हो गई । फिर वो एक दिन उड़ गई ।’ माध्यम से रचना में कल्पना के भाव उकेरे । तो श्री अरुण ठाकर जी ने ऑनलाइन जुड़कर कविता पढ़ी – हर रोज तमाशा होता है, कभी अपना कभी जमाना होता है । सन्नाटा सा होता है, बिन तमाशे के जीने का कहाँ मजा होता है ।
व.उपाध्यक्ष राव शिवराजपाल सिंह जी ने -‘हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई सबका ही है यह वतन, गद्दारों से मुक्त है यही है सबका अरमान औ जतन’ देश भक्ति की रचना सुनाने के बाद कविता में भावपूर्ण रचना ‘अंतिम उत्सव- मृत्यु भी एक महोत्सव है’ ने जीवन के शाश्वत सत्य का उद्घाटन किया ।
अंत में अध्यक्ष लक्ष्मण लड़ीवाला ‘रामानुज’ ने एक गीतिका -‘रहे जहाँ सुहासिनी कभी न अंधकार हो । गीत – कितने मौके दिया समय ने,पगला समझ न पाया । एवं एक विरह गीत-
पीड़ाओं से परिणय को फिर, यादों पर ढोया होगा ।
साँसों पर लिखने से पहले, हर अक्षर बोया होगा। सुनकर भावुक कर दिया
अंत में आयोजक श्री राकेश भारद्वाज जी ने ‘ और कहने को क्या रह गया ‘ प्रस्तुति के साथ अभी आगंतुक कवियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया । गोष्ठी का सुंदर संचालन श्री राव शिवराजपाल सिंह जी द्वारा किया गया ।
इस अवसर पर संस्था को सक्रिय करने हेतु अध्यक्ष द्वारा नया अध्यक्ष का प्रस्ताव की उन्हें ही पीडीआर रहने का सर्व सम्मत निर्णय करते हुए वरिष्ठ उपाध्यक्ष राव शिवराजपाल सिंह जी द्वारा प्रस्तावित श्रीमती अर्चना सिंह ‘अना’ जी, डॉ. अंजू सक्सेना जी, और श्री राजकुमार जी चौहन को कार्यकारिणी सदस्य सहवरित करते हुए कार्यकारणी का पुनर्गठन किया गया ।

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