साहित्य

भ से भोले

कार्तिकेय कुमार त्रिपाठी 'राम'

भोले के संग जीवन सबका,
यूं ही नहीं चल सकता है,
भाव बदल ले जो तू मन का,
हर जन शंकर हो सकता है।
भोले के संग ….
जीवन सबका अपना-अपना,
रंग बदलता रहता है,
कोरे कागज-सा होकर ही,
छवि भोले की गढ़ता है।
भोले का संग ……
सोच ही है जो जन-जीवन की,
रितुएं बदला करती हैं,
अच्छा-अच्छा जो सोचा तो,
मन की वीणा बजती हैं।
भोले का संग ….
भ से भोले,श से शंकर,
जीव चराचर है बस कंकर,
भजा ध्यान से जो भोले को,
खुश हो जाते हैं शंकर।
भोले का संग ….
डगर-डगर तू चलता जाना,
मन भोले का तू बहलाना,
जीवन का ना कोई फ़साना,
बंधन भोले के बंध जाना।
भोले का संग ……
(244/301 वां मनका )
“”””””””””””””
कार्तिकेय कुमार त्रिपाठी ‘राम’
गांधीनगर इन्दौर (म.प्र.)

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