
प्रेम अमृत के ही है जैसा।
समझ न इसको ऐसा वैसा।।
जीवन को यह मधुर बनाए।
बात समझ में यह कब आए।।
त्याग समर्पण से मिल जाए।
खुशियांँ ही बस खुशियांँ लाए ।।
जुड़े प्रेम से बंधन सारा।
सांँसों का है प्रेम सहारा।।
संग प्रेम के धरणी घूमे।
दूर क्षितिज पर नभ को चूमे।।
पुष्प -कली सह है मुस्काती।
हरे रंग में है बलखाती।।
प्रेम बिना है बंजर माटी ।
दिखे नहीं सुंदर परिपाटी।।
लिख डाली है मीरा राधा ।
प्रेम अग्र हारे हर बाधा।।




