साहित्य

प्रकृति

किरण कुमारी 'वर्तनी'

प्रकृति पोषती जीव, मातृ सम हर क्षण प्यारे।।
बिना किए कुछ चाह, चंद्र सूरज अरु तारे‌‌।।

समझोगे कब बात ,वार करना अब रोको।
थम जाएगी श्वास, चलो जन-जन को टोको।।
काम करो यह अग्र, दिन बीतेंगे न्यारे।।
प्रकृति पोषती जीव, मातृ सम हरक्षण प्यारे।।

धुँआ -धुँआ है आज, धरा का कोना-कोना।
बढ़ा प्रदूषण उच्च, रोग जीवन भर ढोना।
जल्दी विपदा टाल,छा न जाए बादल कारे।।
प्रकृति पोषती जीव, मातृ सम‌ हरक्षण प्यारे।।

जल थल हो या व्योम,
बना हैं विष का प्याला।
लोभी बैठे मौन ।
संत फेरे है माला‌‌
रोके कौन विनाश, लोग अपनों से हारे।।
प्रकृति पोषती जीव, मातृ सम‌ हरक्षण प्यारे।।

चुने प्रगति की राह, छाँट भू से हरियाली ।
पृथ्वी हुई कृद्ध, दु:ख मे डूबे माली ।
नदियाँ बदली राह,
देख उद्विग्न खग सारे।
प्रकृति पोषती जीव , मातृ सम हरक्षण प्यारे।।

किरण कुमारी ‘वर्तनी’ जमशेदपुर

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