
हम कवि हैं, कवि ही रहेंगे,
शब्द-शस्त्र लेकर चलते हैं।
युग-निर्माण की अग्नि जला,
इतिहास नया हम रचते हैं।
भीड़ में बिखरे विचारों को,
चुन-चुन कर हम धार देते हैं।
लेखनी बनती धर्म-ध्वजा,
अर्थ, आकार, आकार देते हैं।
दर्द अगर ललकार बने,
या आशा दीप जलाए हो,
हर भाव को स्वर मिलता है,
जो मन के भीतर गाए हो।
जो समय कह न पाया हो,
जो मौन तले दब जाता है,
उस चुप्पी की हुंकार बना,
कवि शब्दों में ढल जाता है।
सच की मशाल उठाए हम,
अँधियारे से भिड़ जाते हैं।
समझौते नहीं—संवेदना में,
सीधे रण में उतर जाते हैं।
टूटे मनों के बीच खड़े,
हम शब्दों के पुल बन जाते हैं।
दिल से दिल तक पहुँचाने को,
भावों के पथ रच जाते हैं।
ना यश चाहिए, ना जयघोष,
ना तालियों की चाह हमें।
कविता ही पहचान हमारी,
कवि होना ही गर्व हमें।
हम साधक हैं भाव-धरा के,
बाज़ार हमें स्वीकार नहीं।
कवि होकर जीना ही जीवन,
इससे बढ़कर संसार नहीं।
जय हो शब्द-साधना की,
जय हो कवि-स्वाभिमान!
कविता जीवित रहे सदा,
कवि रहे युग-युग महान!
दिनेश पाल सिंह दिलकश
जनपद संभल उत्तर प्रदेश



