संस्कारवान शिक्षा ही समर्थ राष्ट्र की नींव है—और गुरुकुल उसका शाश्वत आधार
डाॅ.शिवेश्वर दत्त पाण्डेय

किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी सीमाओं, संसाधनों या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के चरित्र, संस्कार और सामूहिक चेतना से निर्धारित होती है। शिक्षा वह माध्यम है जिसके द्वारा किसी समाज की आत्मा अगली पीढ़ी तक पहुँचती है। यदि शिक्षा केवल सूचना और कौशल तक सीमित रह जाए, तो राष्ट्र भौतिक रूप से समृद्ध होते हुए भी नैतिक रूप से दुर्बल हो जाता है। भारत की प्राचीन गुरुकुलीय शिक्षा परंपरा इसी सत्य की सशक्त साक्षी है, जहाँ शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य निर्माण था, न कि मात्र आजीविका अर्जन।
संस्कारवान शिक्षा मनुष्य को अपने कर्तव्यों का बोध कराती है। यह उसे परिवार, समाज, राष्ट्र और प्रकृति से जोड़ती है। आधुनिक शिक्षा प्रणाली ने ज्ञान और दक्षता तो दी, पर संस्कारों को पाठ्यक्रम से बाहर कर दिया। परिणामस्वरूप आज व्यक्ति अधिकार तो जानता है, किंतु कर्तव्य से विमुख होता जा रहा है। बढ़ता भ्रष्टाचार, सामाजिक असहिष्णुता, हिंसा और मानसिक तनाव इस मूल्यहीन शिक्षा के दुष्परिणाम हैं।
गुरुकुलीय शिक्षा व्यवस्था इस समस्या का समाधान प्रस्तुत करती है। गुरुकुल केवल अध्ययन का केंद्र नहीं था, बल्कि जीवन-शिक्षा का प्रयोगस्थल था। गुरु के सान्निध्य में रहकर शिष्य अनुशासन, सेवा, श्रम, संयम और सहअस्तित्व का अभ्यास करता था। शिक्षा पुस्तकों तक सीमित न होकर आचरण में उतरती थी। यही कारण है कि गुरुकुल से निकले विद्यार्थी विद्वान होने के साथ-साथ चरित्रवान, राष्ट्रनिष्ठ और समाजोपयोगी नागरिक बनते थे।
औपनिवेशिक काल में लागू मैकाले की शिक्षा नीति ने भारतीय शिक्षा की आत्मा को गहरी क्षति पहुँचाई। शिक्षा को संस्कृति और जीवन-दर्शन से काटकर उसे केवल नौकरी प्राप्ति का साधन बना दिया गया। इससे भारतीय समाज में आत्मगौरव और स्वदेशी बौद्धिक चेतना का ह्रास हुआ। आज की पीढ़ी शिक्षित तो है, पर अपनी जड़ों से अनभिज्ञ होती जा रही है।
यह मानना भ्रांति है कि गुरुकुलीय शिक्षा आधुनिक युग में अप्रासंगिक हो चुकी है। वास्तव में, आज के जटिल और तनावपूर्ण समय में इसकी आवश्यकता और अधिक बढ़ गई है। यदि गुरुकुलीय मूल्यों—गुरु-शिष्य परंपरा, योग, ध्यान, नैतिक शिक्षा, प्रकृति के प्रति सम्मान—को आधुनिक विज्ञान, तकनीक और नवाचार के साथ जोड़ा जाए, तो शिक्षा संतुलित और मानवोन्मुख बन सकती है। यह समन्वय भारत को एक विशिष्ट और वैश्विक रूप से अनुकरणीय शिक्षा मॉडल प्रदान कर सकता है।
समर्थ राष्ट्र की कल्पना केवल आर्थिक विकास से पूरी नहीं होती। इसके लिए संस्कारित नागरिकों का होना अनिवार्य है, जो सत्य, करुणा, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रबोध से प्रेरित हों। ऐसी नागरिकता का निर्माण केवल संस्कारवान शिक्षा से संभव है, और संस्कारवान शिक्षा का सबसे सुदृढ़, कालातीत और प्रमाणित आधार गुरुकुलीय परंपरा है।
अतः यदि भारत को पुनः अपनी आत्मिक शक्ति के साथ विश्वपटल पर अग्रणी भूमिका निभानी है, तो उसे अपनी शिक्षा की दिशा पर पुनर्विचार करना होगा। गुरुकुलीय शिक्षा व्यवस्था की पुनर्स्थापना कोई अतीतगामी कदम नहीं, बल्कि उज्ज्वल और सशक्त भविष्य की ओर बढ़ाया गया निर्णायक कदम है। यही मार्ग भारत को सच्चे अर्थों में समर्थ राष्ट्र बना सकता है।
(लेखक दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह के संस्थापक एवंसमूह सम्पादक हैं)




