
वो -साठ पार की स्त्रियाँ
गरिमामयी आभा लिए,
होती हैं हर घर की शान सदा से,
मनमोहक अंदाज है उनका,
ठसक भरी सी चाल…
खनक भरी आवाज है उनकी,
साठ साल की है यही पहचान,
जहाँ…,
बच्चों और बड़ों पर प्यार लुटाती हैं वो,
और वहीं, करती हैं रक्षा
बनकर उनकी रक्षा कवच,
वो ,साठ पार की स्त्रियाँ…|
आँखें धूमिल -पर नजरें पैनी
जो रखती सब पर नजर सदा,
और बताती फर्क सदा
अच्छे और बुरे कर्मो का..,
जो अपने अनुभव और तजुर्बे से,
चेहरे की वो लकीरें और सिलवटें माथे की,
यही तो है श्रृंगार उनका,
साठ पार की स्त्रियों का…|
शशि कांत श्रीवास्तव
डेराबस्सी मोहाली, पंजाब




