
जिन्दगी की राहों मे
गम भी कितने मिल गए ।
कितने हुए बेगाने,
कितने अपने हो गए।।
मिला है जो सिलसिला
गम की परछाइयों से,
शब्दो के बाण से वो
लहुलुहान कर गए।।
अपने थे, जो अपने होकर
जिनसे खुशी नही देखी गईं।
जिन्दगी के सफर मे वो
छांव नही दे पाए।।
दुखों का पहाड़ अब जो
झुकने लगे हैं।
आशा की किरणे मन
जगने लगे हैं।।
होंगे सपने पूरे अब
मंजिल दूर नहीं हैं।
सफ़र जिनगी के
वो हम सफर बन गए है।।
मुन्ना प्रसाद
राजकीय सम्मानित शिक्षक सह कवि
रोहतास बिहार




