साहित्य

हर दिन नारी का

सुमन बिष्ट

मुझे किसी एक दिन की रोशनी नहीं चाहिए,
मैं तो सूरज की तरह हर सुबह उगती हूँ।
संघर्ष की धूप में तपकर भी
अपने सपनों की छाँव बुनती हूँ।

मैं घर की चौखट पर जलता दीप हूँ,
और आकाश में उड़ता विश्वास भी।
मेरी हथेलियों में रोटी की गर्माहट है,
तो आँखों में भविष्य का उजास भी।

मैं माँ की ममता,
बहन की स्नेहिल परछाईं हूँ,
मैं बेटी की उजली उम्मीद,
और स्वयं अपनी ही गहराई हूँ।

मैं खेतों में पसीना बनती हूँ,
कार्यालयों में निर्णय बन जाती हूँ,
कभी चुप रहकर इतिहास लिखती हूँ,
कभी बोलूँ तो आवाज़ बन जाती हूँ।

मुझे वो ताज नहीं चाहिए
जो साल में एक दिन पहनाया जाए,
मुझे वह सम्मान चाहिए
जो हर दिन जीवन में निभाया जाए।

क्योंकि मैं उत्सव नहीं,
एक सतत् सृजन की कहानी हूँ
मैं सरल नारी हूँ,
मैं हर दिन की एक नयी रवानी हूँ।

सुमन बिष्ट, नोएडा

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