
मुस्कुरा कर चाँद कहने लगा है मुझसे -कि..
आज मैं उदित हुआ हूँ पूर्ण कलाओं के संग
और ,
चाँदनी भिगो रही है इस धरा को चंद्रिका के संग,
वृक्षों के साये भी हो रहे हैं विलीन आपस में धरा पर,
दूर… बहुत दूर… जहाँ,
चाँद खेल रहा है लुका छिपी का खेल
घने बादलों के संग….
वहीं , प्रकृति ने भी
ओढ़ ली है एक चादर घने शबनम की
जो आभास कराती है अंधकार का धरा पर,
इस घने अंधेरे धुंध में तुम्हारा -प्रिये
मैं कर रही हूँ इंतजार बेसब्री से प्रिये,
उसी पथ पर लेकर -दीपक
जिस पथ पर तुम आ रहे हो -प्रिये,
कि कहीं राह तुम भटक ना जाओ प्रिये,
कि कहीं राह तुम भटक ना जाओ -प्रिये ||
शशि कांत श्रीवास्तव
डेराबस्सी मोहाली, पंजाब




