साहित्य

प्रेम

डॉ गीता पांडेय अपराजिता

अनुपम लीला प्रभु की न्यारी।
प्रेम भक्ति है सबसे प्यारी।।
इसके बस में दुनिया सारी।
महक उठे उर की फुलवारी।।

ईश्वर का उपहार प्रेम है।
जीवन का आधार प्रेम है।।
धरती का श्रृंगार प्रेम है।
वशीकरण का सार प्रेम है।।

जिसके हृदय प्रेम है रहता।
भक्ति भाव में वह है बहता।।
छल प्रपंच से दूरी रखता।
नहीं किसी से ईर्ष्या करता।।

बसते मन में मदन मुरारी।
जोगन बनकर जन्म सुधारी।।
बना लिया सांसारिक दूरी।
कर ली अपनी इच्छा पूरी।।

करती मीरा प्रेम श्याम से।
शबरी करती रही राम से।।
मीरा राधा का मान किया।
बसा कृष्ण ने था हृदय लिया।।

वशीभूत रघुवर हो जाते।
वेर प्रेम में जूँठे खाते।।
ताकत बहुत प्रेम में होती।
सकल कलुषता को है धोती।।

प्रेमिल पंथ सभी को भाया।
अंतस सुरभित होती काया।।
बंधता नहीं जगत की माया।
जिसने प्रभु को है अपनाया।।

नहीं दिखावा इसमें करना।
बीज प्रेम का बोते रहना।।
सत्य सनातन रीति हमारी‌।
जीता प्रेम घृणा है हारी।।

डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

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