सम्भल तीर्थ परिक्रमा का महत्व बताकर अजय कुमार शर्मा ने लोगों को किया जागरूक, फिर धीरे-धीरे कदम बढ़े पुनर्जीवीकरण की ओर
सुबोध कुमार गुप्ता की कलम से सम्भल तीर्थ परिक्रमा वर्णन

सम्भल तीर्थ परिक्रमा के पुनर्जीवीकरण पर चर्चा करने से पहले स्कन्द पुराण के शम्भल माहात्मय के इक्कीसवें अध्याय की कुछ पंक्तियां देखते हैं-
*चतुर्धा कथितः पुत्र ! प्रदक्षिणाविधिर्महान् । सर्वत्र स्नानदानादेः प्रकारस्त्वेक एव हि।।*
उक्त पंक्तियों में ब्रह्मा जी नारद जी से चार प्रकार की परिक्रमा के बारे में बता रहे हैं। अतः स्पष्ट है कि सम्भल में प्राचीनकाल से ही चार प्रकार की परिक्रमाएं होती आ रही हैं।
एकं देवालयस्योक्तं प्राकारस्य द्वितीयकम्।तृतीयं सर्वतीर्थानां तत्र-तत्र प्रदक्षिणम्।।
शम्भलग्राम परिधेस्तीर्थेभ्यो बहिरुत्तमम्। प्रकृष्टो दक्षिणो हस्तो यत्र तत् स्यात् प्रदक्षिणम्।।
प्रथम परिक्रमा- सम्भल की प्रथम प्रकार की परिक्रमा नगर के केन्द्र बिंदु हरि मंदिर के गर्भगृह के चारों ओर होती थी। यह परिक्रमा सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती थी क्योंकि इसमें श्री विग्रह के दर्शन और परिक्रमा का विशेष महत्व है।
द्वितीय परिक्रमा- द्वितीय प्रकार की परिक्रमा हरिमंदिर के चारों ओर परकोटे की होती थी। इस परिक्रमा में श्री कल्कि मंदिर भी शामिल होता था, जो हरिमंदिर परकोटे का ही हिस्सा था। यह परिक्रमा मंदिर परिसर के चारों ओर घूमकर पूर्ण की जाती थी। धार्मिक दृष्टि से इसका गहरा महत्व है।
तृतीय परिक्रमा- तृतीय प्रकार की परिक्रमा हरिमंदिर परकोटे के तीन योजन (12 कोस) क्षेत्र में होती थी। इसमें प्रत्येक तीर्थ की परिक्रमा होती है। इसमें यह परिक्रमा भाद्रपद मास में आयोजित की जाती थी। परिक्रमा करने वाले श्रद्धालु प्रत्येक तीर्थ पर स्नान, दान और पूजा-अर्चना करते थे। इस परिक्रमा में संयम,भक्ति और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व था। सूर्यकुण्ड पर स्नान के बाद परिक्रमा शुरु होती थी।
चतुर्थ परिक्रमा- यह परिक्रमा चौबीस कोसीय परिक्रमा कहलाती है जो आज भी दीपावली के बाद चतुर्थी,पंचमी और षष्ठी के दिनों में सम्पन्न होती है। यह परिक्रमा वंशगोपाल तीर्थ से प्रारंभ होकर हरिमंदिर तथा समस्त 68 तीर्थों और 19 कूपों को दाहिनी ओर रखते हुए चक्रतीर्थ, नैमिषारण्य तीर्थ से होते हुए चंदेश्वर महादेव तीर्थ पर परिक्रमा पहुंचती है जहाँ रात्रि विश्राम करके अगले दिन पुनः वंशगोपाल पहुँचकर समाप्त होती है। श्रद्धालु व्रत और नियम का पालन करते हैं। यह परिक्रमा न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है अपितु इससे सामाजिक और सांस्कृतिक एकता भी, प्रकट होती है। सत्तर के दशक में प्राचीन 24 कोसीय पुण्यदायिनी, मोक्षप्रदायिनी परिक्रमा पर मजहबी विवाद का ग्रहण लग गया जिसके फलस्वरूप लोग परिक्रमा लगाने से डरने लगे। केवल क्षेमनाथ और वंशगोपाल का फेरी मेला इस परिक्रमा का प्रतीक चिह्न बनकर रह गया। धीरे-धीरे लोग इस परिक्रमा के संचलन व महत्व आदि के बारे में पूरी तरह से भूल गए। कुल मिलाकर लगभग चार दशकों तक परिक्रमा बंद रही। परिक्रमा मार्ग विलुप्त हो गया। वर्ष 2006 की बात है जब लोगों को अपने घरों में, मन्दिरों में जागरण-कीर्तन करने तक की भी अनुमति लेनी पड़ती थी। सनातन विरोधी शासन होने पर भी सम्भल की सामाजिक, शैक्षिक एवं सांस्कृतिक जागृति हेतु समर्पित संस्था हिन्दू जागृति मंच ने इस परिक्रमा का पुनर्जीवीकरण करने के लिए कमर कसी। इस निमित्त श्री अजय कुमार शर्मा के नेतृत्व में मंच के सदस्यों ने आसपास के गाँवों में जाकर लोगों से सम्पर्क किया। उनके आवागमन की, रुकने की, भोजन-जलपान की, रात्रि विश्राम की और अत्यंत महत्वपूर्ण उनकी सुरक्षा की गारंटी देने का वायदा किया। जिसके फलस्वरूप लगभग डेढ़ दर्जन श्रद्धालुओं ने 26 अक्टूबर 2006 को प्रातः बेला में वंशगोपाल तीर्थ से यात्रा प्रारम्भ की और 27 अक्टूबर 2006 को पुन: वंशगोपाल आकर परिक्रमा का समापन किया। यह परिक्रमा बिना किसी राजनैतिक,सामाजिक एवं धार्मिक संगठन के सहयोग से केवल और केवल हिन्दू जागृति मंच के तत्वावधान में ही शुरू की गई थी। तीर्थ परिक्रमा करने वाले सभी श्रद्धालुओं का स्वागत कार्यक्रम किया और उन्हें प्रशस्ति पत्र भी प्रदान किये गये। अब इस पुनीत कार्य को और आगे बढ़ाने के लिए मंच के सदस्यों ने अगले वर्ष लगभग पांच सौ गाँवों में जा-जाकर परिक्रमा के महत्व को बताने के लिए लोगों से सम्पर्क किया। सभी राजनैतिक संगठनों, धार्मिक एवं सामाजिक संगठनों से भी अपील की जिसके फलस्वरूप अगले वर्ष की परिक्रमा में श्रद्धालुओं की संख्या में कई गुना बढ़ोत्तरी हुई। उन सभी श्रद्धालुओं की सूची बनाई जाती थी। उन्हें पूरी परिक्रमा की वीडियोग्राफी की डीवीडी प्रदान की जाती थी। उनका स्वागत-सम्मान, कार्यक्रमों के द्वारा किया जाता था। हिन्दू जागृति मंच के उस समय किए गए प्रयासों का यह फल है कि वर्तमान में लगभग तीन लाख श्रद्धालु 24 कोसीय परिक्रमा लगाकर धर्म लाभ उठाते हैं। अब शासन-प्रशासन का ध्यान भी परिक्रमा पथ को सुन्दर करने में, पक्का करने में और चौड़ीकरण करने में लगा हुआ है। परिक्रमा श्रद्धालुओं के लिए जगह-जगह विश्राम, जलपान-भोजन, चिकित्सा, रात्रि विश्राम, आवागमन एवं सुरक्षा की जिम्मेदारी सम्भल के प्रशासन, सामाजिक व राजनैतिक संगठनों तथा धार्मिक संगठनों के द्वारा प्रदान की जाती है। आज सम्भल की चौबीस कोसीय परिक्रमा अपने भव्य रूप में है।अयोध्या-मथुरा-काशी आदि की परिक्रमाओं में गिनी जाने लगी है।
*पदे पदे पापहानिरटतामपि शम्भले। किं पुनः श्रद्धया तीर्थयात्रा फले मभीप्सताम् ||*
उक्त पंक्तियों में स्पष्ट है कि जब सम्भल में चलने-फिरने वालों के भी पद-पद पर पाप नष्ट होते हैं, तो तीर्थयात्रा की सफलता पर विश्वास रखकर तीर्थयात्रा करने वालों के विषय में है। कहना ही क्या अर्थात् वे तो सीधे मोक्ष की प्राप्ति करेंगे। अतः हम सबको प्रण लेना चाहिए कि वर्तमान पीढ़ी के साथ-साथ भावी पीढ़ी को भी सम्भल परिक्रमा सम्भल माहात्म्य एवं भगवान कल्कि के बारे में बताएंगे और जाग्रत करेंगे।
जय श्री कल्कि।
*सुबोध कुमार गुप्ता (प्रदेश महामंत्री) हिंदू जागृति मंच,सम्भल*


