स्त्री-तत्त्व का विवेक: नारी शक्ति के सम्मान अथवा सम्मान सहित त्याग में ही समाज का कल्याण सम्भव है
ज्योतिषाचार्य अरुण कुमार मिश्र

भारतीय सनातन परंपरा में स्त्री को केवल देह या सामाजिक भूमिका तक सीमित नहीं किया गया, बल्कि उसे चेतना, शक्ति और विवेक का सजीव स्वरूप माना गया है। ऋग्वेद से लेकर उपनिषदों, स्मृतियों और दर्शनों तक स्त्री को ब्रह्मज्ञान की अधिकारी माना गया है। प्रस्तुत विचार कि “ब्रह्मवादिनी स्त्री साक्षात् दुर्गा, रमा और शारदा है” कोई भावुक अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि गहन शास्त्रीय, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक आधारों पर टिका सत्य है।

शास्त्रीय प्रमाण और दृष्टि:
ऋग्वेद में गार्गी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा जैसी ब्रह्मवादिनी स्त्रियों का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने याज्ञवल्क्य जैसे ऋषियों से ब्रह्मतत्त्व पर संवाद किया। बृहदारण्यक उपनिषद में गार्गी का प्रश्न पूछना और ब्रह्मविद्या पर अधिकार इस बात का प्रमाण है कि स्त्री को ज्ञान की देवी कहा जाना केवल काव्यात्मक नहीं, दार्शनिक सत्य है।
मनुस्मृति का बहुचर्चित श्लोक “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः” स्पष्ट करता है कि जहाँ स्त्री का सम्मान होता है, वहाँ दैवी चेतना सक्रिय रहती है। ब्रह्मवादिनी स्त्री की वाणी को देवीसूक्त के समान कहा जाना इसलिए भी उचित है, क्योंकि देवीसूक्त स्वयं ऋग्वैदिक ऋषिका वाक् अम्भृणी द्वारा दृष्ट है।
गुणत्रय का शास्त्रीय आधार:
सांख्य दर्शन के अनुसार समस्त सृष्टि सत्त्व, रज और तम—इन तीन गुणों से संचालित होती है। यह नियम स्त्री और पुरुष दोनों पर समान रूप से लागू होता है। अतः हर स्त्री को स्वतः देवी मान लेना और हर व्यवहार को सहन करना शास्त्रीय दृष्टि नहीं है।
यदि स्त्री सत्त्वगुण में प्रतिष्ठित है, तो वह ब्रह्मवादिनी है—पूजनीय है। किंतु यदि रजोगुण या तमोगुण प्रबल हो, तब भी उसका अपमान वर्जित है, पर उससे दूरी बनाना आत्मरक्षा और शांति का उपाय है। यह वही मध्यम मार्ग है जिसे श्रीकृष्ण ने गीता में “युक्त आहार-विहार” के रूप में प्रतिपादित किया।
वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक प्रमाण:
आधुनिक मनोविज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि हर व्यक्ति का व्यवहार उसके मानसिक गुणों और संस्कारों से संचालित होता है। न्यूरोसाइंस बताता है कि आक्रामकता, कटुता और असंतुलन प्रायः भावनात्मक असुरक्षा और हार्मोनल असंतुलन से जुड़ा होता है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से निरंतर टकराव व्यक्ति के तनाव हार्मोन (कॉर्टिसोल) को बढ़ाता है, जिससे मानसिक अशांति, क्रोध और अवसाद उत्पन्न होता है। इसके विपरीत, “दूरी बनाना” या “संघर्ष से हट जाना” तनाव को कम करता है और मानसिक स्वास्थ्य को सुरक्षित रखता है। इस प्रकार शास्त्रों द्वारा सुझाई गई दूरी की नीति आज के वैज्ञानिक शोधों से भी प्रमाणित होती है।
सामाजिक प्रमाण और व्यवहारिक सत्य:
सामाजिक अनुभव बताता है कि जहाँ स्त्री-पुरुष संबंधों में निरंतर टकराव, आरोप और विद्रोह होता है, वहाँ परिवार, समाज और संतति तीनों प्रभावित होते हैं। इसके विपरीत, जहाँ सम्मान के साथ सीमायें निर्धारित की जाती हैं, वहाँ सामाजिक संतुलन बना रहता है।
दूरी का अर्थ सामाजिक बहिष्कार नहीं, बल्कि मर्यादा की रक्षा है। कई बार दूरी ही आत्मचिंतन का अवसर बनती है, जिससे व्यक्ति अपनी भूलों को पहचान पाता है। यह सामाजिक सुधार का भी एक मौन किंतु प्रभावी माध्यम है।
समन्वित दृष्टि का निष्कर्ष:
अतः यह स्पष्ट है कि नारी का सम्मान अनिवार्य है, किंतु विवेक के साथ। ब्रह्मवादिनी स्त्री का पूजन आत्मोन्नति का मार्ग है, जबकि असंगत व्यवहार वाली स्त्री से शांति के साथ दूरी बनाना आत्मरक्षा और सामाजिक संतुलन का साधन है।
सनातन धर्म न तो अंध-पूजा सिखाता है, न अंध-विद्रोह; वह विवेक, संतुलन और शांति का मार्ग दिखाता है। यही दृष्टि व्यक्ति को आंतरिक रूप से स्थिर और समाज को दीर्घकाल तक स्वस्थ बनाये रखती है।
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ज्योतिषाचार्य अरुण कुमार मिश्र
(आचार्य अरुण दैवज्ञ)
प्रेरक वक्ता
राष्ट्रीय अध्यक्ष: माँ शारदा वेलफेयर सोसाइटी
सम्पर्क सूत्र: +91-9450276488
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