
पुरानी कहावत है कि –
का वर्षा जब कृषि सुखाने।
समय चूकि अब का पछताने।।
कदाचित यह कहावत विभिन्न शैक्षिक और प्रतियोगी परीक्षाओं पर भी बिल्कुल सटीक बैठती है।ध्यातव्य है कि कोई भी परीक्षा केवल ज्ञान की जाँच नहीं, बल्कि समय, विवेक और अनुशासन की भी परीक्षा होती है। माध्यमिक और उच्चतर स्तर की परीक्षाओं में यह बार-बार देखने को मिलता है कि कई विद्यार्थी विषय का सम्यक् ज्ञान होते हुए भी अपेक्षित अंक प्राप्त नहीं कर पाते। इसका प्रमुख कारण है—शीघ्रता और शुद्धता के बीच संतुलन का अभाव। कोई अत्यधिक शीघ्रता में त्रुटियाँ कर बैठता है, तो कोई शुद्धता के मोह में समयाभाव का शिकार हो जाता है।
शीघ्रता का आशय यहाँ हड़बड़ी नहीं, बल्कि समय के प्रति सजगता से है। परीक्षा-समय सीमित होता है और उसी सीमा में अपनी सम्पूर्ण तैयारी को उत्तर-पत्र पर उतारना होता है। जो विद्यार्थी समय का विभाजन नहीं कर पाते, वे या तो अंत के प्रश्न अधूरे छोड़ देते हैं या उत्तरों को समुचित रूप नहीं दे पाते। इसलिए आवश्यक है कि प्रश्नपत्र पढ़ते ही समय का विवेकपूर्ण वितरण किया जाए और सरल प्रश्नों से प्रारंभ कर आत्मविश्वास अर्जित किया जाए।
दूसरी ओर शुद्धता का तात्पर्य केवल वर्तनी या गणना की त्रुटियों से मुक्ति नहीं, बल्कि विचारों की स्पष्टता और उत्तर की प्रामाणिकता से है। गलत तथ्यों, अपूर्ण तर्कों और असंबद्ध उत्तरों से परीक्षक प्रभावित नहीं होता। विशेषतः गणित, विज्ञान और व्याकरण जैसे विषयों में एक छोटी-सी अशुद्धि पूरे उत्तर को निरर्थक बना देती है। अतः शुद्धता अभ्यास, समझ और सावधानी से आती है।
वास्तव में परीक्षा में सफलता का मार्ग शीघ्रता और शुद्धता के संतुलित समन्वय से होकर जाता है। न तो अंधी तेजी उपयोगी है और न ही अत्यधिक धीमापन। यह संतुलन नियमित अभ्यास से विकसित होता है—समयबद्ध मॉडल प्रश्नपत्र हल करने से, उत्तर-लेखन का अभ्यास करने से और अपनी त्रुटियों की समीक्षा करने से।यहाँ शिक्षकों की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है। कक्षा में केवल पाठ्यवस्तु पढ़ाने के साथ-साथ विद्यार्थियों को समय-प्रबंधन, उत्तर-प्रस्तुति और पुनरीक्षण की आदत सिखाई जानी चाहिए। वहीं अभिभावकों को भी बच्चों पर केवल “जल्दी लिखो” या “सब सही करो” जैसे दबाव डालने के स्थान पर संतुलन की समझ विकसित करनी चाहिए।
अंततः यह स्वीकार करना होगा कि परीक्षा में उत्कृष्टता केवल ज्ञान से नहीं, बल्कि कौशल से आती है। शीघ्रता समय को साधती है और शुद्धता ज्ञान को सार्थक बनाती है। जब दोनों का सम्यक् मेल होता है, तभी विद्यार्थी न केवल अच्छे अंक प्राप्त करता है, बल्कि आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ता है।
परीक्षाओं के दरम्यान शीघ्रता कैसे प्राप्त की जा सकती है तो इसका एक सरल,सहज और बिल्कुल सामान्य सा उपाय है।बहुधा देखा जाता है कि परीक्षार्थी कठिन विषयों यथा गणित,विज्ञान,अंग्रेजी आदि के अनेक प्रश्नों को पहले रफ हल करते हैं और रफ हल करने के बाद उसका फेयर करते हैं।वस्तुत: चूक यहीं पर होती है।विद्यार्थियों को चाहिए कि वे कोई भी रफ कार्य करने के बजाय शुरू से सुंदर और स्पष्ट अक्षरों में फेयर करते हुए ही प्रश्नों को हल करें।यदि प्रश्न हल नहीं होता है या फिर उसका उत्तर कुछ और प्राप्त होता है तो उसे विकर्ण बनाती रेखाओं से अर्थात एक कोने से दूसरे कोने तक जाने वाली सरल रेखाओं से काट कर फिर से हल करें और यदि प्रश्न का उत्तर सही प्राप्त होता है तो उसके बाद दूसरे प्रश्न को हल करें।इससे उनका समय प्रबंधन अच्छा होगा और प्रत्येक प्रश्न को हल करने के लिए निर्धारित समय उन्हें मिल सकेगा।इसके अलावा जो प्रश्न हल करते समय फंस जाए या भटकने का भय लगे तो तुरंत उसपर उलझने की बजाय जो प्रश्न अच्छी तरह से हल करने योग्य समझते हों,उसे हल करना चाहिए और अंत में पुनः समय शेष रहने पर उलझे हुए प्रश्नों को हल करने का प्रयास करना चाहिए।
शीघ्रता और शुद्धता की दृष्टि से कलमों की भी भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है।बहुधा विद्यार्थियों द्वारा परीक्षा नजदीक आने पर नई कलमें खरीदी जाती हैं,जोकि बिल्कुल अनुचित है।परीक्षा के समय नई कलमें प्रयोग करने पर अंगुलियों द्वारा उन्हें पकड़ने का अभ्यास न होने के कारण अंगुलियों में दर्द होता है तथा कलमों के बाल प्वाइंट कम घिसने के कारण उत्तर पुस्तिका के पन्नों पर रगड़ कर चलते हैं।जिससे अक्षर भी सुस्पष्ट नहीं होते और लिखने का फ्लो भी कम होता है,समय ज्यादा लगता है।अतएव विद्यार्थियों को परीक्षा नजदीक आने की बजाय परीक्षा के महीनों पहले ही कई कलमें खरीदकर उनको इतना प्रयोग करना चाहिए कि उनकी स्याही चौथाई खत्म हो जाए।ऐसा होने पर अंगुलियों द्वारा उनको पकड़ना भी सीख लिया जाएगा और उनके बाल प्वाइंट भी घिसने के कारण पन्नों पर पूरे फ्लो के साथ चलते हैं तथा अक्षर भी सुस्पष्ट लिखते हैं।जिससे विद्यार्थियों को प्रश्नों के उत्तर लिखने में सहजता,सरलता और उनके समय का सुंदर प्रबंधन होता है,हड़बड़ी में गड़बड़ी नहीं होती है।
इसलिए आज की प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षा-व्यवस्था में विद्यार्थियों के लिए यही संदेश प्रासंगिक है कि न हड़बड़ी, न सुस्ती; बल्कि सजग शीघ्रता और सुनिश्चित शुद्धता ही सफलता का मूल मंत्र है।इससे समय की बचत होती है,लिखावट सुंदर होती है और सफलता की संभावना पहले से अधिक होती है।




