
अपनी मंजरी संग लहराती
तुलसी एक पौधा नहीं है,
दिव्य गुणों की खान है यह,
जहां रोग शोक,संताप को हरे
वहीं विघ्न बाधा को भी मिटाये,
रामा – श्यामा नाम है तुम्हारे
विष्णु प्रिया सब कहते तुमको,
घर आंगन को सदा महकाती हो,
माता का हम रूप मानकर,
साँझ -सवेरे दीप जला कर,
सदा पूजते हैं हम उसको,
जिस घर में नित पूजा होती,
मिट जाती विपदा उस घर की,
माता का स्वरूप मान तुलसी को,
नित हाथ जोड़ कर शीश नवाते हैं।।
शशि कांत श्रीवास्तव
डेरा बस्सी मोहाली, पंजाब




