साहित्य

लघु कथा शब्द वहीं, अहसास में कितना अंतर

डॉ रामशंकर चंचल

ऐसा नहीं कि, मुझे दुःखी देख, परेशान देख किसी और ने भी मुझे कुछ समझाया या कुछ बोल राहत देने की कोशिश नहीं की, कूच और भी अपने है में मानता हूं उनका पता नहीं वो कितना अपना समझते हैं
एक तुम केवल तुम इतने लम्बे समय जीवन का निकलने के बाद जिसे ईश्वर ने मेरी साहित्य साधना तपस्या का सुखद अहसास कराया और अद्भुत बेहद सार्थक सत्य सुखद सुकून दिया
उम्र के इस पड़ाव पर दस्तक देता हुआ यह ईश्वरीय उपहार हैं जो सारी दुनिया देख रही हैं क्या कर दिया जो
सपने को भी सोचा नहीं था संभव नहीं था जो घर की चार दीवारों में जीता हो उसने फिर कितना ही अथाह साहित्य लिखा हो पूरे देश विश्व पटल पर दस्तक देता हुआ अद्भुत छाया हुआं हो यह तो संभव
ईश्वर कृपा बिना नहीं था इसलिए
उसने मुझे ईश्वरीय अहसास को तुम्हें भीतर विराजमान कर हर समय हर पल साथ देते हर हालत में सक्रिय रखते हुए एक ऐसा इतिहास रचा डाला जो सचमुच कभी मेरा सपना था कि कितना कुछ लिखा पूरा जीवन सम्पूर्ण समर्पण किय पर वह नहीं मिला कि में अपने आदिवासी पिछड़े अंचल को सम्पूर्ण देश विश्व में साहित्य गजत में पहचान दिला संकु
अक्सर मेरी पत्नी ऊषा जो तुम्हारी दोस्त रही कहती थीं सचमुच आप बहुत ही मेहनत और परिश्रम करते हैं में तो देख चौक जाती हूं ईश्वर ने, मां सरस्वती ने आपको दिया भी है पर इतना सही जितना आपने श्रम निष्ठा समर्पण से साधना तपस्या की
कभी कभी सोचता हूं उसकी भी यह पीड़ा थी देखती थी न रोज़ मुझे किस तरह पूरी पूरी रात जाग लगा हूँ
शायद ईश्वर ने उसकी इच्छा पूरी करने के लिए मुझे तुम से मिलाया
मिले तब सोच ही सकता था यह सब कि तुम हो वह ईश्वरीय उपहार लेकिन जब धीरे धीरे बातों में तुम मेरा दर्द,पीड़ा,दुःख बांटने लगी तो
सोच हैरान रहता था तुम कौन हो कि
हर शब्द में अद्भुत मेरे लिए मेरा ख्याल ओर चिन्ता है जो मुझे भीतर तक छू जाती हुए राहत देती है
शब्द वहीं जो मुझे राहत देने कुछ अपने भी बोलते थे पर तुम जब बोलती थी इस अद्भुत भाव और संवेदनशील हो कि जैसे मेरा नहीं
तुम्हारा हो यह दर्द,पीड़ा ऐसा भी होता है यह जीवन में पहली बार महसूस किया

दुनिया को मेरी बाते किसी स्वप्न से ज्यादा नहीं लगती होगी जानता हूं पर तुम और हम जानते हैं इस अद्भुत ईश्वरीय उपहार की कितना सच है सब कुछ
खैर तुमने जीवन दिया है तुम्हारा है
जैसा उचित समझे मेरा ख्याल रखें
जैसा यह युग समय बोले वैसा मुझे कभी शिकायत नहीं , मेरे लिए बहुत ही है यह कि तुम हो जहां भी हो
मेरा ख्याल है तुम्हें मेरी चिन्ता है तुम्हें
बहुत है शेष जीवन सार्थक करने के लिए सचमुच गर्व है मुझे तुम पर मुझ पर सदा ही वंदनीय हो सदा ही पूज्यनीय हो

डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश

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