
वह लड़की
याद आती हैं
बहुत सुंदर सहज सरल
किसी ईश्वर सौम्य छवि मुस्कान
खेतों में दौड़ती
कभी पेड़ पर चढ़ जाती
खिलखिलाती हुई
मक्का की रोटी को
बड़े चाव से खाती
कभी पेड़ो पत्तों संग
वह भी झूमती हुई
गाती कोई प्यारा सा
भीली गीत गुनगुनाती
कभी गोबर से कंडे बनाती
कभी हैड पंप से पानी
खींचती थक जाती
रुक कर सांसे लेती
वह मासूम सी प्यारी लड़की
बचपन से ही
लग जाति घर परिवार की
जिम्मेदारी को लिए
भी लकड़ी रोज़ रोज़
स्कूल आती और
पढ़ती है पूरे मन से
वह लड़की कितनी भोली है
सदा ही प्रसन्न हो जाती हैं
अपनी छोटी छोटी
आवश्कता लिए सदा खुश
वह लड़की याद है
उसके घर आंगन में
कभी दस्तक देता तो
इतनी खुश हो जाती
जैसे कोइ ईश्वर ने
उसके घर आंगन में दस्तक दिया
लग जाती
सेवा में , खटिया बिछा कर
बैठने का दोनों हाथ जोड़
आग्रह करती हुई
दौड़ जाती हैंड पंप पर दस्तक दे
लौटा अच्छी तरह साफ़ कर
पानी लेने
कभी खेतों से चने
तोड़ अंगारे जला
सेक कर उन्हें
एक बर्तन में रख
खाने का आग्रह करती
वह लड़की याद आती हैं
कितना कुछ है उसके पास
अथाह प्यार और अपनापन
आदर और सम्मान
अतिथि का मान
वह नादान लड़की
कितना कुछ सिखा गई
मुझे भी
सदा ही सभी को आदर दे
अतिथि को ईश्वर रूप मानना
सदा ही हर पल
हर हाल में खुश रहना
वह लड़की जो अभी तो
अज्ञानी है और
दे जाती हैं
अद्भुत ज्ञान
जिंदगी जीने की
सार्थक परिभाषा
वह लड़की याद आती है
और उसकी जैसी सभी
गांव की लड़की याद आती हैं
मेरा गांव ईश्वर रूप
मेरा गांव
जिंदगी की परिभाषा
सीखता हर हाल में
मस्त और प्रसन्न रहता
डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश


