
विमल हृदय में, गिरधर बसते ।
चरण दरश से, नयन छलकते ।।
वन उपवन भी, हरि हरि जपते ।
सकल जगत के, तम प्रभु हरते।।
नयनन छवि जो, हरदम बसती ।
नटखट छलिया, अदभुत लगती ।।
तन मन धन से, प्रभु नित भजते ।
दुख सब तन के, वह फिर हरते ।।
मधुर वचन से, डगर सरल हो ।
विमल विनय से, सुख प्रतिपल हो ।।
नीलम अग्रवाल “रत्न” बैंगलोर




