साहित्य

विमल

नीलम अग्रवाल "रत्न"

विमल हृदय में, गिरधर बसते ।
चरण दरश से, नयन छलकते ।।

वन उपवन भी, हरि हरि जपते ।
सकल जगत के, तम प्रभु हरते।।

नयनन छवि जो, हरदम बसती ।
नटखट छलिया, अदभुत लगती ।।

तन मन धन से, प्रभु नित भजते ।
दुख सब तन के, वह फिर हरते ।।

मधुर वचन से, डगर सरल हो ।
विमल विनय से, सुख प्रतिपल हो ।।

नीलम अग्रवाल “रत्न” बैंगलोर

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