
सब के सब अधिकार जमाये बैठे हैं।
शिक्षा को व्यापार बनाये बैठे हैं।
झूठी -सच्ची खिदमत में सब उनके,
झूठों का दरबार सजाये बैठे हैं।
ज्ञान झेलता निर्वासन अब जग से,
खुद तो कारोबार सजाये बैठे हैं।
फूलों की खुशबू से महके ये बगिया,
चाहत का संसार सजाये बैठे हैं।
सच का दामन बचा न झूठी दुनिया में,
झूठे तो श्रंगार सजाये बैठे हैं।
आदि अंत की चिंता आखिर किसको है,
आभारों का द्वार सजाये बैठे हैं।
वाई.वेद प्रकाश
द्वारा विद्या रमण फाउंडेशन
शंकर नगर, मुराई बाग, डलमऊ, रायबरेली उत्तर प्रदेश 229207
9670040890




