
प्रस्तावना:-
जब किसी स्त्री का हृदय प्रेम में पड़ता है, तो वह अपने समूचे अस्तित्व को उस प्रेम के नाम अर्पित कर देती है। प्रेम यदि वैध, पारदर्शी और सामाजिक मर्यादाओं में बंधा हो तो वह जीवन को संवारता है, परंतु यदि वही प्रेम किसी विवाहित पुरुष के प्रति हो जाए, तो वह धीरे धीरे आत्मविनाश का कारण बन जाता है। यह लेख उसी कटु यथार्थ को सामने लाने का प्रयास है, जिसे समाज प्रायः अनदेखा कर देता है, किंतु जिसका दंश अनेक स्त्रियाँ जीवन भर झेलती हैं।

भावनात्मक आरंभ:-
अक्सर यह सब बहुत सहजता से आरंभ होता है। वह पुरुष कहता है कि उसकी पत्नी उसे नहीं समझती, उसका दाम्पत्य जीवन शुष्क हो चुका है, और उसे सच्चा अपनापन केवल तुमसे ही मिलता है। स्त्री इन शब्दों को प्रेम समझ बैठती है। उसे लगता है कि वह किसी टूटे हुए जीवन को जोड़ रही है। यहीं से भ्रम का बीज पड़ता है।
पुरुष का दोहरा जीवन:-
वह पुरुष भीतर से जानता है कि सामाजिक प्रतिष्ठा, परिवार, संतान, संपत्ति और धर्म सब पत्नी के साथ बंधे हैं। इसलिए वह संसार के सामने पत्नी का ही हाथ थामे रहता है। त्योहार, संस्कार, उत्सव और सामाजिक मंच पत्नी के साथ ही साझा करता है। तुम्हारे हिस्से आते हैं चोरी छिपे फोन, समय चुराकर की गई मुलाकातें और निरंतर प्रतीक्षा।
शास्त्र स्पष्ट कहते हैं कि विवाह केवल सामाजिक अनुबंध नहीं, बल्कि धर्म का आधार है। मनुस्मृति के अनुसार विवाह के पश्चात् स्त्री ही पुरुष की धर्मपत्नी कहलाती है और उसी के साथ उसका धर्मिक दायित्व पूर्ण होता है। जो संबंध धर्म और समाज से छिपाया जाये, वह स्थायी नहीं हो सकता।
स्त्री की पीड़ा:-
स्त्री आशा करती है कि एक दिन वह पुरुष सब कुछ छोड़कर उसके पास आ जाएगा। परंतु यह आशा धीरे धीरे पीड़ा में बदल जाती है। जब कभी पत्नी को संदेह होता है, वही पुरुष सबसे पहले तुम्हें ही दोषी ठहराता है। वह कहता है कि तुम उसके पीछे पड़ी थीं, तुमने उसे फँसाया था। इस क्षण स्त्री स्वयं को कठघरे में खड़ा पाती है।
विज्ञान और मनोविज्ञान का दृष्टिकोण:-
आधुनिक मनोविज्ञान बताता है कि अवैध संबंधों में मस्तिष्क तात्कालिक सुख देने वाले हार्मोन के प्रभाव में आ जाता है। यह सुख क्षणिक होता है, परंतु उसके टूटने पर अवसाद, अपराधबोध और आत्महीनता जन्म लेती है। पुरुष इस स्थिति से प्रायः निकल जाता है, क्योंकि उसके पास परिवार का सहारा होता है, जबकि स्त्री अकेली रह जाती है।
अंतिम परिणाम:-
अक्सर अंत बहुत कठोर होता है। एक दिन बिना किसी स्पष्टीकरण के फोन बंद हो जाते हैं, संदेशों का उत्तर नहीं आता और धीरे धीरे हर माध्यम से संपर्क समाप्त हो जाता है। स्त्री के पास केवल प्रश्न रह जाते हैं और पुरुष अपने परिवार के जीवन में लौट जाता है, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
नैतिक संदेश:-
नीति शास्त्र कहता है कि जो संबंध छिपाकर निभाया जाए, वह न तो धर्मसम्मत होता है और न ही मानव गरिमा के अनुकूल। जो पुरुष अपनी पत्नी के प्रति निष्ठावान नहीं है, उससे किसी और स्त्री के प्रति निष्ठा की अपेक्षा करना स्वयं को धोखा देना है।
उपसंहार:-
यदि आज भी मन विचलित हो, तो एक बार स्वयं से प्रश्न कीजिये कि क्या आप केवल किसी के जीवन की छाया बनकर रह जाना चाहती हैं। प्रेम वह नहीं है जो आपको अंधेरे में रखे, प्रेम वह है जो आपको गर्व से स्वीकार करे। आत्मसम्मान के साथ किया गया एकाकी जीवन, अपमानजनक प्रेम से कहीं अधिक श्रेष्ठ होता है।
लेखक परिचय
ज्योतिषाचार्य अरुण कुमार मिश्र
(आचार्य अरुण दैवज्ञ जी महाराज)
सनातन धर्म तथा संस्कृति के प्रेरक-वक्ता)
राष्ट्रीय-अध्यक्ष:- माँ शारदा वेलफेयर सोसाइटी
सम्पर्क सूत्र: +91-9450276488
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