साहित्य

आशियाना

जगदीश कुमार धुर्वे

भविष्य की देहरी पर
चिंता चुपचाप बैठी है,
आँखों में प्रश्न—
सपने पूरे होंगे भी या नहीं?
रोटी, कपड़ा, मकान—
तीन शब्द नहीं,
पीढ़ियों की थकान हैं,
जो पैरों को गाँव से शहर तक
चलाती आई है।
हर हृदय में
एक ही आकांक्षा धड़कती है—
मिट्टी का हो या ईंटों का,
पर हो एक अपना घर।
जहाँ दीवारें
केवल ईंट-सीमेंट न हों,
बल्कि
विश्वास और उम्मीद से जुड़ी हों।
योजनाओं के काग़ज़ से निकलकर
जब सपना ज़मीन पर उतरता है,
तो छत बन जाती है
सम्मान की भाषा।
अब यह घर
सिर्फ़ आश्रय नहीं,
सुरक्षा की छाया है,
जहाँ मेहनत
साँस लेकर विश्राम करती है।
माता-पिता की
खामोश तपस्या
आज रंग बनकर
दीवारों पर उतर आई है।
माँ की गोद,
पिता की बाँहों में
गुड्डू-गुड़िया ने
निडर होकर नींद पाई है।
और गुड़िया—
जिसकी हँसी में अब
डर नहीं,
उसने पहली बार
भविष्य को
आशियाने के भीतर देखा है।
स्‍वरचित अप्रकाशित रचना
©️जगदीश कुमार धुर्वे
सुखतवा नर्मदापुरम (म.प्र.)

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