
एक समय में ढिबरी का महत्व अलग ही था। धीमी लव के साथ प्रज्वलित होना उसकी अपनी भूमिका थी मानो हर घर की मेहमान ढिबरी था। उसके बिना सारे काम अधूरे पड़ा रहता था। खाना पकाना, पढ़ना लिखाना, या किसी भूले वस्तु को ढूंढने के लिए ढिबरी का ही उपयोग किया जाता था। एक छोटा सा शीशी,बोतल या लोहे की बनी छेद वाला मेहमान जिसे कपड़ा का बाती पेनहाया जाता था। किरोसिन तेल जिसे मिट्टी के तेल भी कहा जाता है उसी में दिन रात पड़ा बेचारा बाती अपनी मुंह को शाम होते ही अग्नि की लव लिए हर काम मे अपनी योगदान पूरी सलीनता के साथ देता। कभी कभी बिछुड़ने के बाद कही ढेर मे फेक दिया जाना बहुत ही मार्मिक होता। पुनः नए ढिबरी का निर्माण सभी वास्तुकर कर लेते थे ।उसमे बनाने मे कोई खर्चा नहीं आता। तीन रंगों के लव के साथ जलना उनका स्वभाव ही था। आंधी में भी डट कर लड़ता, अपने आस पास कीट पतंगों को भक्षण करना उनका बरसाती स्वभाव था। उसके जलने का समय निश्चित होता था। सूरज ढलने से पहले उसे सांझा पराती दिया के नाम से घर के बुजुर्ग लोग घर के बाहर और अंदर दिखाना अपने आप मे कहा जाता था। जिसे लोग सांझा पराती लगाना कहते थे। मान्यता यह भी रही की घर के बुजुर्गो दादी, मां के द्वारा बच्चो को नजर उतारने में भी ढिबरी का काम लिया जाता था। बच्चे पढ़ते वक्त अपने पास में ही रखा करते थे। उस समय ढिबरी की अहमित होती थी
कहा जाता हैं की ढिबरी मे तेल है तो घर की अर्थव्यवस्था ठीक ठाक हैं। अगर ढिबरी मे तेल नही होना उस घर की अर्थव्यवस्था ठीक नही होना जाना जाता था। ढिबरी जलाते समय बच्चो की सरारती भी कम नहीं होती, मुंह से फुक मारकर बुता देना, पढ़ने का मन न हो तो ढिबरी को फुक मारकर बुता देना। बुजुर्ग लोगो को परेशान करना, दादी के गाली सुनना, ढिबरी बुता देने से ही सारी अनर्गल काम हो जाती थी। ढिबरी से चूल्हे की आग जलाना, उसी के तेल निकलकर या लकड़ी भिंगोकर उसी से आग जलाना अर्थात एक पंथ दो काम करना ढिबरी का ही होता था। शरारती बच्चे भी कम नहीं होते लकड़ी के डंठल या पुआल के छेददार डंठल से धुआं निकला, बीड़ी जलाना आदी ढिबरी की ही देन थी। जो आज विलुप्त होना बहुत ही लोगों को याद भरी लव बनकर रह गई।
आज के दौर में ढिबरी महत्व हीन हो गई हैं। इस चकाचौधकी दुनिया मे ढिबरी बेचारी कहा चली गईं पता ही नही चलता। आज वह ढिबरी बस यादें बनकर रह गई हैं।
मुन्ना प्रसाद
शिक्षक सह रचनाकार
रोहतास बिहार


