आलेख

शिक्षकों को सरस्वती का संदेश

विद्यावाचस्पति उदयराज मिश्र

निःशब्द सृष्टि में ध्वनि और शब्द संचरण के साथ चैतन्यता का बोध कराने वाली,तम,कलुष को मिटाकर नव सृष्टि,नव विहान और मधुमय वातावरण को सृजित करने वाली ज्ञान की पूज्या आराध्या देवी माँ सरस्वती का प्राकट्योत्सव भारतवर्ष का एक महत्त्वपूर्व पर्व और कि अज्ञान पर ज्ञान के विजय का महोत्सव है।यह पर्व धार्मिक होने के साथ साथ शैक्षिक और परिवर्तन का प्रतीक भी है।हेतु-कारण तथा साधन-साध्य को अपने में सहेजे हुए ये पर्व विद्यालयों के लिए अत्यंत सकारात्मक एवम शिक्षकों को नव संकल्प लेने का पर्व है।ये पर्व धरती पर समता,ममता और बंधुत्व का सर्वतोभद्र पाठ पढ़ाने वाले गुरुओं के लिए भी अभिप्रेरण,चिंतन,मनन और आत्मदर्शन का पर्व है।
इतिहास साक्षी है कि परिवर्तन की अजस्र धाराएं सदैव शिक्षालयों से ही प्रवहित और पल्लवित होती हैं।ऐसे में शिक्षकों की भूमिका और उनके गुरुतर दायित्व उन्हें और भी सक्रिय योगदान हेतु उद्यत रहने की सीख देते हैं।कदाचित कहना अनुचित नहीं होगा कि सम्प्रति देश में जो प्रतिकूल परिस्थितियां प्रबल होती दिख रहीं हैं,उनका एकमात्र उन्मूलन शिक्षा और सिर्फ शिक्षालयों से शिक्षकों द्वारा ही अंतिम रूप से किया जा सकता है।
हम कितने ही मतदाता जागरूकता दिवस मनाएं,रैलियां करें या सरकारी कार्यक्रमों का आयोजन कर पत्र-पत्रिकाओं में सुर्खियां बनें, जबतक शिक्षक जाग्रत नहीं होता तबतक उद्देश्यों की पूर्ति असम्भव ही नहीं अपितु अकल्पनीय भी है।अतः शिक्षकों को हरहाल में अपने दायित्वों का स्मरण कर जागना ही होगा।परिस्थितियों और समस्याओं की परवाह किये बिना राष्ट्र की जटिल वेदनाओं के निराकरण हेतु जगना ही होगा।
सम्प्रति सरकारी तंत्रों और विभिन्न पदों पर पदस्थ अधिकारीगण शिक्षकों को कर्मचारी मानकर उनके सम्मान के साथ आए दिन ओछी हरकतें करते हुए असम्मान ज्ञापित ही नहीं करते अपितु उनका मानसिक और आर्थिक शोषण भी करते हैं।अस्तु ऐसे उच्च पदस्थ अधिकारीगण और राजनेताओं को भी सही मार्ग पर लाने का उत्तरदायित्व शिक्षकों का ही है।हमारी शिक्षा और संस्कारों में कहीं न कहीं कोई खोट है जिससे हम राष्ट्र परायण, कर्तव्यनिष्ठ,उदार,उद्दात्त चित्त,सहृदय,विज्ञ और चरित्रवान अधिकारियों,नेताओं और आम जनमानस का सृजन करने में असफल रहे हैं।अतः हम शिक्षकों को परिस्थितियों से समझौता करने के बजाय क्रांतिकारी बनते हुए बुराइयों,कमियों के खिलाफ आत्म मंथन करते हुए अपने शिष्यों के मानस में ऐसे भाव पिरोने होंगे जो आगे चलकर चंद्रगुप्त,राणा प्रताप,शिवाजी, राम,अर्जुन,रसखान,कबीर ,सूर, तुलसी,रैदास,लक्ष्मीबाई आदि के अनुकरण करें और स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण करने में सक्षम हों।
स्मरण रहे कि हे शिक्षकों!परिवर्तन के इस मार्ग पर तुम्हें आत्म बलिदान हेतु भी उद्द्यत रहना होगा।यदि तुम्हारे मार्ग में बाधक सत्ताएं हों या कोई अन्य हो तो भी कोई परवाह किये बिना तुम उन्हें उखाड़ फेंको।याद रहे सत्ताओं से राष्ट्र ऊपर है।राष्ट्र रहेगा तो सत्ताएं आएंगीं और जाएंगी,किन्तु तुम्हारा बलिदान व्यर्थ नहीं होगा।
समग्र राष्ट्र का उत्थान ही राष्ट्र की सेवा होगी।अतएव वसन्त पंचमी का ये पर्व तुम्हारे दिलों में एक हलचल पैदा करे और हमारा शिक्षक अपने दायित्व को पूरे मनोयोग से वहन करे,यही माँ वाणी से प्रार्थना है।
वसन्त पंचमी केवल ऋतु परिवर्तन का पर्व नहीं है, यह भारतीय चेतना में अज्ञान से ज्ञान की यात्रा का उत्सव है। यह वह दिन है जब भारत माँ ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती के प्राकट्य को स्मरण करता है—वही सरस्वती जो कभी पद्मासना होकर साधना, स्थैर्य और तप का संदेश देती हैं, तो कभी हंसवाहिनी बनकर विवेक, विवेचन और नीर-क्षीर-विभाग का शाश्वत पाठ पढ़ाती हैं।यह महापर्व ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती के प्राकट्य का दिवस होने के साथ ही साथ आज नैतिक,मानवीय और सामाजिक मूल्यों के ह्रास के दौर में शिक्षकों के लिए आत्ममंथन और चिंतन का भी दिन है।शिक्षकों को स्वयं ही मंथन करते हुए घोषणा करने का दिन है कि वे कर्मचारी नहीं अपितु प्रजापति ब्रह्मा हैं,राष्ट्रनिर्माता हैं।कदाचित इसीलिए ऋग्वेद में सरस्वती को केवल देवी नहीं, बल्कि चेतन प्रवाह कहा गया है—
“प्र चेतना धेनवः सरस्वती”
(ऋग्वेद 1.3.10)
अर्थात् सरस्वती चेतना की वह धारा हैं, जो मनुष्य को जड़ता से मुक्त कर बौद्धिक और नैतिक उन्नयन की ओर प्रवाहित करती हैं।
पद्मासना सरस्वती का स्वरूप स्थिरता का प्रतीक है। कमल दल पर स्थित देवी यह संकेत देती हैं कि कीचड़ में रहते हुए भी पवित्रता संभव है। यह शिक्षा विशेष रूप से शिक्षकों के लिए है—कि सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक अव्यवस्थाओं के बीच भी वे अपने चरित्र, मर्यादा और विवेक को अक्षुण्ण रखें। शिक्षक का आसन पद्मासन है—जहाँ से वह समाज को दिशा देता है, न कि परिस्थितियों के साथ बहता है।
वहीं हंसवाहिनी सरस्वती का स्वरूप विवेक का मूर्त रूप है। हंस का गुण है—नीर-क्षीर-विभाग। आज जब सत्य और असत्य, नैतिकता और अवसरवाद, राष्ट्रहित और स्वार्थ के बीच की रेखाएँ धुँधली होती जा रही हैं, तब शिक्षक से अपेक्षा है कि वह हंसवत् विवेकशील बने और अपनी पीढ़ी को भी वही विवेक प्रदान करे।यजुर्वेद में सरस्वती को प्रज्ञा और मेधा की अधिष्ठात्री कहा गया है—
“सरस्वती मेधा धात्री”
(यजुर्वेद 19.41)
स्पष्ट है कि सरस्वती केवल वाणी नहीं, बल्कि बौद्धिक साहस और नैतिक स्पष्टता की शक्ति हैं।
इतिहास साक्षी है कि किसी भी राष्ट्र का पतन या उत्थान सीधे उसके शिक्षकों से जुड़ा होता है। आज हम चाहे कितने ही मतदाता जागरूकता अभियान चला लें, कितनी ही योजनाओं की घोषणाएँ कर लें किंतु यदि शिक्षक चेतन नहीं है, तो समाज भी जड़ ही रहेगा। राष्ट्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिसे समाज को गढ़ना है, उसी शिक्षक को आज व्यवस्था ने मात्र “कर्मचारी” के स्तर पर सीमित कर दिया है।
परंतु वेदों की दृष्टि में शिक्षक कभी कर्मचारी नहीं रहा। अथर्ववेद शिक्षक को राष्ट्र का मेरुदंड मानता है—
“ब्रह्मा राष्ट्रस्य बृहस्पतिः”
(अथर्ववेद 12.1.10)
आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षक स्वयं को पुनः उसी ब्रह्मा और बृहस्पति के रूप में पहचाने। सत्ता की उपेक्षा, प्रशासनिक दबाव और सामाजिक उपेक्षा—ये सभी क्षणिक हैं। शिक्षक का दायित्व शाश्वत है।वसन्त पंचमी का संदेश स्पष्ट है—पद्मासना बनो, ताकि चरित्र अडिग रहे।हंसवाहिनी बनो, ताकि विवेक अटल रहे।
यदि शिक्षक यह भूमिका स्वीकार कर ले, तो वही शिक्षक चंद्रगुप्त, राणा प्रताप, शिवाजी, राम, अर्जुन, कबीर और विवेकानंद को जन्म देता है। और यदि वह मौन हो जाए, तो वही मौन राष्ट्र के भविष्य को भी मौन कर देता है।आज आवश्यकता किसी नई नीति से अधिक जाग्रत गुरु-चेतना की है। वसन्त पंचमी इसी जागरण का पर्व है। यही इसका राष्ट्रार्थ है, यही इसका शैक्षिक संदेश।

-विद्यावाचस्पति उदयराज मिश्र

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