साहित्य

ऊ दिन

मुन्ना प्रसाद

कईसे भूलाई ऊ दिन के
जहा गरवईया आंगन मे
चाउर के खुदी के
प्यार से चुंगत रहल।
कोयल पापिह आम के डाली पे
बरगद के छांव में नीम के निबोरी
खात रहल।।

कईसे भुलाई ऊ दिन के
जवन सुगंध रहे ऊ माटी में
बाधी से बनल ऊ खाटी मे,
प्यार त अईसन मिलत रहल
जईसे दीया जरत तेल बाती मे।।

कईसे भुलाई ऊ दिन के जवन
आंख मिचौनी, दोलहा पाती
मन से जवन हटत नईखे।
गीली डंडा खेल खेले से
जियरा मन भरत नईखे।।

कईसे भुलाई ऊ दिन के
जबू बरखा बरस गइल त,
बैलन के जोड़ी देखत ,
केतना निमन लागत रहल।
गीत सुन सुन के घंटी घुघुर से
मन केतना हरसत रहल।।

कईसे भुलाई ऊ दिन के जब
पानी से भरल ताल तलइया
देख मन हरसा जाई।
गर्मी मे गईया के पीछे
सांझ तक लइको घरे आ जाई।।

कई से भुलाई ऊ दिन के जब
पानी मे कागज के नाव चलावत
गरमी मे कागज के पंखा हिला वत।
बैई ठ दलानी मे पुरानिया बतियावास
कथा कहानी से सबके हरसवास।

कई से भुलाई ऊ दिन के जवन
प्रेम रहल ऊ तास खेलन मे
जे दिन दिन भर बीता दीही।
धान कूट के चाउर चुन के
माईयो खाय बना दीही।।

कई से भुलाई ऊ दिन के
होखे सांझ त ढिबरी
सबके घर बारा जाई।
झोंक झोंक के लकड़ी गोइठा
निमन रोटी सेका जाई।।

कईसे भुलाई ऊ दिन के
राम भजन सब केहू गावे
ढोल मजीरा झाल बजावे।
कवनो परब त्योहार आई त
मील जुल के गोतिया भाई खावे।।

कईसे भुलाई ऊ दिन के
आज से कुछ दिन पीछे जाई
कईसन संस्कार मीलत रहल।
दादा जी के बोली सुनके
सब केहू डेरात रहल।।

कईसे भुलाई ऊ दिन के
कवनो झगड़ा बात रहें त
सभे मन्दिर त बोटरा जाई।
बात होई सरपंच जी से
झगड़ा झंझट फारिया जाई।।

कई से भुलाई ऊ दिन के
घरे आ जाईहन जब हित नाता त
तोशक तकिया बीटूरा जाई।
धूम धाम से गीत गारी गवा ई
घरही लाइका- लइकी छेका जाई।।

कई से भुलाई ऊ दिन जब
जय राम जी समधी जी कहस
बोली मे केतना मिठास रहे।
पियर पियर धोती गमछा
कान्हे कावर दियात रहे।

मुन्ना प्रसाद
राजकीय सम्मानित शिक्षक
रोहतास बिहार

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