साहित्य

बदलाव

सुमन बिष्ट

तुम साल बदलते देख रहे हो,
मैंने चेहरे बदलते देखे हैं।
कैलेंडर के पन्नों से ज़्यादा,
लोगों के इरादे फिसलते देखे हैं।

सबने समय को दोष दिया,
मैंने इंसानों को बदलते देखा।
सामने कही गई बातों से,
पीछे कदमों हटाते को देखा।

वादे जो कल तक सच थे,
आज उनका मज़ाक बनते देखा है
कसमों की ऊँची आवाज़ों को,
ख़ामोश चुप्पियों में मरते देखा है।

जो साथ चलने की बात करते थे,
वो अब मोड़ पर रुकते दिखते हैं ।
अपनी जरूरत खत्म होते ही,
अपने ही रास्ते चुनते दिखते हैं।

कुछ मुस्कानें उधार ली थीं,
जो वक्त पर लौटाई नहीं गई।
कुछ रिश्ते भी बोझ बन गए,
जिन्हें निभाने की हिम्मत नहीं रही।

मैंने कुछ सच को धीरे-धीरे,
समझौते में ढलते देखा है
और आत्मा को बचाने के लिए,
लोगों को अकेले रहना सीखते देखा है

अब साल बदले या न बदले,
मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है।
मैंने इंसान बदलते देख लिए,
अब समय से कोई शिकवा नहीं है।

सुमन बिष्ट, नोएडा

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