
कविता है मोहन की मुरली की मस्तानी तान ।
व्रज की भोरी गोरी राधा की अधरन मुस्कान ।।
ब्रह्मा की वाणी कल्याणी है श्रुतियों का ज्ञान ।
वीणा पाणी के वीणा का ये सप्तम स्वर गान ।।
यह धरती की मधुर गंध अरु है पानी का स्वाद ।
पावक की पावन शक्ति और अंतरिक्षीय आवाद ।।
शीतलता यह सुलभ समीरी अंडज ई आजाद ।
पंच तत्व की पावनता मुनि ऋषियों की ईजाद ।।
गौरीपति की नृत्यनाटिका डमरू ध्वनि ये मान ।
गीता है ये गोविंद जी की यह कुरूक्षेत्र का गान ।।
लेखनी है ये वेदव्यास की जिसे कहते लोग पुरान ।
सृष्टि के चौदह लोकों में यह अति अधिक सम्मान ।।
यह चंदा की कीर्ति कौमुदी और तारों की चमकान ।
प्रान व्यान उदान अपान ये पंच प्राणन महिं समान ।।
पूरक कुभंक और रेचक यह ही प्राणायाम दरम्यान ।
स्वास स्वास की आस यही है मधुर मधुर प्रिय कान ।।
वाद्य यंत्र की मधुरं बोली खग कुल कुल कल गान ।
बच्चों की शातिर शैतानी ए अभिभावक का ध्यान ।।
उपवन में मधुकर मधु गुंजन ये तन तितली पर तान ।
मृग की मस्त चौकडी यह ही गज गज की ये चिघ्रान ।।
डा. राजेश तिवारी मक्खन
झांसी उ प्र




