साहित्य

इनायत

नरेश चन्द्र उनियाल

जिए हैं आज  तक भी हम,
उसी की  यह  हिफाजत है,
करम मौला का है सब यह,
उसी  की   यह  इनायत  है।

वो चाहे तो बस एक क्षण में,
पलट  दुनिया  को  दे  सारी,
है मर्जी  जब  तलक उसकी,
जगत   सारा   सलामत   है।

हे ईश्वर अब इनायत  कर भी
दे,   संतान     पर      अपनी,
कुशलता  से   जिए   दुनिया,
यही    मेरी   भी   चाहत   है।

है सजदे  में  झुका  सिर  यह,
ए  मालिक    रात   दिन   तेरे,
तेरे  चरणों   में   अर्पित  रोज
ही       मेरी       इबादत    है।

रहेगा   कष्ट   यह   तब   तक,
कि  जब  तक  चाहेगा  ईश्वर,
बिना  मर्जी  के   उसकी  कुछ
नहीं     होता,   हकीकत    है।

✍️ नरेश चन्द्र उनियाल,
पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड।

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