साहित्य

बिहारी के सच्चे व्यंग्य या तीर

विद्यावाचस्पति डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’

नहिं परागु नहिं मधुर मधु,
नहिं बिकासु इहिं काल।
अली कली ही सौं बंध्यौ,
आगे कौन हवाल॥

नायिका में पूर्ण आसक्त देख नायक
को शिक्षा देते हुए कवि कहता है कि
न अभी इस कली में पराग आया है,
न कली में मधुर मकरंद ही आया है।

नायिका यौवन में मदमस्त अरे ओ
नायक जब यह कली फूल बनकर
पराग तथा मकरंद से युक्त होगी,
उस समय तुम्हारी क्या दशा होगी।

कविवर बिहारी ने राजा जयसिंह को
व्यंग्य करते हुए यह कहा कि विवाह
के बाद वह अपने जीवन में रानी के
साथ कितने अधिक तल्लीन हो गये।

विकास कार्य की तरफ उनका कोई
ध्यान ही नहीं हैं और राजकीय कार्य
से भी दूर हो गए हैं ऐसे में राज काज
संचालन का भार कौन सम्भालेगा !

बिहारी की यह रचना सीधे राजा
जयसिंह पर एक तीक्ष्ण कटाक्ष थी,
व तगड़ा झटका देने वाली भी थी,
राजा जयसिंह को झटका लगा भी।

व्यंग्य से राजा जयसिंह संभले भी,
अपनी रानी के आसक्ति से निकले और अपने राज्य कार्य में शुरू कर दिया पूरा व उचित ध्यान देना भी।

कविवर विहारी जी के शब्द कितने
असरदार थे, जिससे प्रतीत होता है
कि मानव अपने स्वभाव के अनुरूप
मृगतृष्णा के पीछे भागता ही रहता है।

बिहारी जी के दोहे कितना असरदार
हैं उनके इस दोहे से पता चलता है,
“सतशैया के दोहरे, ज्यों नाविक के तीर,
देखन में अच्छे लगैं, घाव करैं गम्भीर”।

वातावरण और जमाना, दोनो उन
लम्हों को भी उजागर करते हैं,
किसी उपमा से, किसी को सीख दें,
उसे अन्योक्ति अलंकार कहते हैं ।

आदित्य वर्तमान में यदि कोई शख़्स
किसी शासक या प्रशासक को इस
तरह का किसी व्यंग्य रूप में लिख दे,
तो लेखक की कैसी शामत आए।

अमीर अमीर और गरीब गरीब हो रहा है:

क्या देश के ग़रीबों में राष्ट्रभक्ति
नहीं है, उन्हें तिरंगे से प्यार नहीं है,
बिलकुल है, गरीब का भी देश पर
उतना ही हक़ जितना अमीरों का है।

हमारे देश में अमीरों, ग़रीबों के बीच
के फ़र्क़ दिन प्रति दिन बढ़ते जा रहे हैं,
क्योंकि गरीब पैसे से ही नहीं बल्कि
बहुत से मूल अधिकारों से भी वंचित हैं।

पिछले एक साल में भारत देश में
अरबपति 102 से 142 हो गये हैं,
और ग़रीबी की रेखा से नीचे रहने
वाले साढ़े चार करोड़ बढ़ गए हैं।

अमीर अमीर होता गया,
गरीब गरीब होता गया,
दोनो को पूरी मदद करने वाला भी
ऐसी चालें बढ़चढ़ के चलता गया।

एक ऐसा उदाहरण यहाँ प्रस्तुत है,
एक रेल लाइन के ऊपर पुल बनाने
की निविदा अख़बार में निकली,
श्रवण ने तीन करोड़ फार्म में भरी।

और सात्विक जी ने नौ करोड़ का
टेंडर जमा किया और अधिकारी ने
फ़ोन कर पूछा तो सात्विक ने यह
बताया कि डिटेल्ज़ अभी भेजता हूँ।

सात्विक ने कहा की तीन करोड़
आपके होंगे और तीन करोड़ मेरे,
उस से पूछा गया, पुल कैसे बनेगा,
वो बोला पुल श्रवण ही बनायेगा।

आदित्य सात्विक जैसे बड़े नाम ही
भारत में ख़ूब फलते व फूलते भी हैं,
नौ करोड़ में से छः करोड़ लूट कर
102 से 142 करोड़ में शामिल होते हैं।

विद्यावाचस्पति डॉ कर्नल
आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ

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