साहित्य

बिन भोले सब झूठा

कार्तिकेय कुमार त्रिपाठी 'राम'

जब-जब हम भोले से मिलते,
जग भर की बतियाते हैं,
नहीं किसी की चिन्ता करते,
मंद-मंद मुस्काते हैं।
जब-जब हम …
जो आया है इस धरती पर,
उसका जाना पक्का है,
चलना है तो बस भोले का,
एक प्रेम का सिक्का है।
जब-जब हम …
अंतस उसको भूल गया,
दर्पण जब-जब सच बोला है,
परछाई के बिना ये जीवन,
बिन रस्सी का झूला है।
जब-जब हम …
धरा मगन है चलने में और,
हम भोले को जपनें में,
मन का सब संताप मिटा दो,
बस भोले के हंसने में।
जब-जब हम ..
इसको देखा,उसको देखा,
कौन,कहां किससे रूठा है,
जब भोले को देख लिया तो,
बाकी सब झूठा-झूठा है।
जब-जब हम ….
(250/308 वां मनका)
“””””””””””””
कार्तिकेय कुमार त्रिपाठी ‘राम’
गांधीनगर, इन्दौर (म.प्र.)
7869799232

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