
पिता नाम उत्तानपाद था, ध्रुव उनकी संतान।
बालक ध्रुव की लिखूं कहानी, हृदय बसे भगवान।।
माँ सुनीति ही प्रथम गुरू थीं,दिखलायीं हरि राह।
जब ध्रुव उर में प्रश्न कई थें,मन में थी बस आह।।
दूजी माता सुरुचि हुई थीं,करती थीं अपमान।
बालक ध्रुव की लिखूं कहानी,हृदय बसे भगवान।।
बैठें ध्रुव थें गोद पिता के,दीं थीं सुरुचि उतार।
रूठा-रूठा तब ध्रुव का था,पूरा ही संसार।।
शासन ध्रुव का भ्रात करेगा,कर उसका गुणगान।
बालक ध्रुव की लिखूं कहानी,हृदय बसे भगवान।।
आहत मन था श्री चरणों में,निस दिन प्रभु का ध्यान।
गोद बिठाओ नेह वृष्टि दो,नारायण कर भान।।
नहीं जगत् में कोई अपना,था इसका संज्ञान।
बालक ध्रुव की लिखूं कहानी,हृदय बसे भगवान।।
नेह दियें हरि ध्रुव तक आकर,मान दियें ध्रुव- भाव।
अटल इरादे वाले ध्रुव की,ईश चलातें नाव।।
आसमान में निश्चल तारा,जगमग ध्रुव की शान।
बालक ध्रुव की लिखूं कहानी, हृदय बसे भगवान।।
वर्तिका अग्रवाल ‘वरदा’
वाराणसी
उ.प्र.




