साहित्य

ग़ज़ल (शृंगार-विरह रस)

दिनेश पाल सिंह दिलकश

नैनों में सपन बसाता ही
जो मन का देव कहलाता ही।

दूर हुआ तो साँसें रूठीं
पास रहा तो प्राण समाता ही।

यादों की पायल छनक-छनक
हर पल मुझको तड़पाता ही।

इश्क़ की सेज सजी आँखों में
नींद मगर उड़ा जाता ही।

होंठों तक आकर रुक जाए
दिल जो नाम दोहराता ही।

प्यास लगी है रूह तलक
उसकी इक झलक काफ़ी ही।

साथ रहा तो जीवन महका
बिन उसके सब सन्नाटा ही।

“दिलकश” कहे,विरह भी पूजा
जो प्रेम अमर कर जाता ही।

*दिनेश पाल सिंह दिलकश*
*जनपद संभल उत्तर प्रदेश*

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