साहित्य

सब लूट गये—हास्य-व्यंग्य

जयचन्द प्रजापति "जय'

कई साल तक चक्कर मारने पर भी सरकारी काम मेरा अटका रहा। बहुत कोशिश की पैडल मारी,वही ढाक के तीन पात, खोदा पहाड़ निकली चूहिया। सब गुड़ गोबर रहा। सारी मेहनत पर पानी फिर गया।

किसी ने कहा कि दलाल का इतना चक्कर मारे होते तो दो मंजिला मकान होता। अपनी कोठी होती। नौकर चाकर उपर से होते। हाथी घोड़ा द्वार की शान होते।

भाई साहब सुबह ही नहा धोकर, क्रीम पाउडर लगाकर अपने देशी रूआब के साथ एक दलाल के घर पर पहुँच गया। मुझे देखते ही तिरछी नजरों से देखकर मंद-मंद मुस्काया। दलाल समझ गया यह भी बलि का बकरा बनने चला आया है।

पहुंचते ही दलाल के चरणों में अपनी पगड़ी उतार कर रख दी। आप ही मेरे माई- बाप हैं। मैं दहाड़े मार कर रोया। उस दलाल ने मुझे हाथों से सहारा देते हुए ढाढस बधांते हुये मेरे गालों पर एक-एक आंसू पोछ डाला। एक अपना सा प्रतीत हुआ। अब मैं आश्वस्त हो गया कि मेरा काम होने में देर नही लगेगा।

कसाई जैसे बकरे पर निगाह मारता है वही निगाह उस दलाल ने मेरे उपर डाली। मेरे अंत:मन को टटोलने का प्रयास करने लगा। मेरी औकात को आंकने लगा। मुझे अपने भावों से नापना चालू किया कि इन महोदय से कितनी रकम वसूल की जा सकती है।

दलाल ने कहा- पलक झपकते ही मिनटों का काम सेकंडों में कर दूंगा। बड़ी पहुँच वाला हूँ। एक से एक अधिकारी को अपनी जेब में रखता हूँ। जिससे चाहा उसको रबड़ की मोहर की तरह ठप्पा मार दिया।

भाई साहब बैंक का सारा बैंलेस उस दलाल के वरद हस्त पर रख दिया। इस भरोसे के साथ कि अब सरकारी दफ्तरों से चक्कर मारने की छुट्टी मिल जायेगी।

सब लूट गये। वादा पर वादा आज हो जायेगा, कल हो जायेगा। कह-कह कर घर की पाई-पाई वसूल डाला लेकिन मामला जस का तस। घर की उड़द मिट्टी में मिलाकर रामनाम जप रहा हूँ। भगवान करे कभी किसी दलाल के हाथ न फंसे।
……
जयचन्द प्रजापति “जय’
प्रयागराज

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