
दिन-दिन बढ़ती जा रही, रिश्तों में तकरार।
बढ़ी आपसी दूरियाँ, आँगन में दीवार।।
आत्ममुग्धता बढ़ गई, बदले सोच विचार।
कुंठित कुत्सित लोग हैं, रिश्ते लगते भार।।
व्यस्त चाकरी में हुए, अपनों से सब दूर।
समय काटना भार है, बूढ़े सब मजबूर।।
ठंडी इतनी बढ़ गई, धुँध हुआ चहुँओर।
दुबके सिकुड़े वृद्ध जन,करें चाय पर जोर।।
भाई- भाई से करे,नित नवीन इक रार।
धनलोलुपता उर बसे,ठगने को तैयार।।
पुस्तैनी ज़र महल पर,लगी सभी की आँख।
जा बैठे परदेस में, उगी सभी को पाँख।।
भले रोग से ग्रस्त हैं, नहीं मिलन की चाह।
कृपा करें भगवान जी,वही दिखाएँ राह।।
गठरी पापों की भरी,थके-थके हल्कान।
आन उबारें राम जी,करें जगत पुलकान।।
डॉ.पुष्पा सिंह




