
काली कोट उतारी उसने,
धरती ओढ़ी पहचान,
काग़ज़ की अदालत छोड़ी,
मिट्टी बना संविधान।
कलम रखी, फावड़ा थामा,
कानून से खेत की ओर चला,
जहाँ फैसले फाइलों में थे,
यहाँ पसीने से सच जला।
कल तक धारा, दफ़ा पढ़ी,
आज मौसम की चाल समझे,
बार की कुर्सी छोड़ के अब,
हल की हर एक बात समझे।
बहसें थीं शब्दों की भारी,
यहाँ मौन भी बोल उठता है,
बीज जब धरती में गिरता,
वकील का सपना उगता है।
कचहरी में तारीखें थीं,
यहाँ ऋतु का ही राज,
फसल ही अब फैसला है,
मेहनत बने सबूत आज।
कल तक न्याय माँगा उसने,
आज न्याय बोता है,
वकील बना जब किसान,
तब भारत खुद को जोता है।
माथे पर पसीना, आँखों में,
सपनों की सच्ची धार,
काग़ज़ से निकल कर उसने,
मिट्टी से जोड़ा व्यवहार।
कहता है वो मुस्काकर अब,
कानून बड़ा या खेत महान?
जहाँ अन्न बचे, देश बचे—
वही सबसे बड़ा संविधान।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश




