
रुख़ पे मुस्कान मगर आँख भरी लगती है।
दिल में गहरी सी कोई बात छिपी लगती है।
गूँज भौरों की नहीं आज सुनाई देती,
गुल की तासीर में खुशबू की कमी लगती है।
बात गर बोलना तो सोच समझकर बोलो,
यह जुबाँ जब भी फिसलती है बुरी लगती है।
खोले तो खोले भला आँख से कैसे पट्टी,
चापलूसों से सियासत ये भरी लगती है।
शहर के जालिमो के खिल गए चहरे *अम्बुज*,
कोई मासूम कली आज खिली लगती है।
चनरेज राम अम्बुज




